Skip to main content
Skip to main content
✍ मराठी साहित्य, संस्कृती आणि लेखनाचे व्यासपीठ
प्रवेश करा | सदस्य व्हा
मिसळपाव
मिसळपाव मराठी साहित्य

Main navigation

  • मुख्य पान
  • नवे लेखन
  • कथा
  • कविता
  • चर्चा
  • पाककृती
  • पर्यटन
  • ललितकला
  • नवे प्रतिसाद

आदाब अर्ज है !( २६-०७-११) हार जाने का हौसला है मुझे.........

अ — अश्फाक, Sun, 03/28/2010 - 08:17

प्रतिक्रिया द्या
49507 वाचन

💬 प्रतिसाद (95)
अ
अश्फाक गुरुवार, 04/15/2010 - 09:09 नवीन
१५-४-१० खुद को कितना छोटा करना पड्ता है! बेटे से समझौता करना पडता है!! जब सारे के सारे ही बेपर्दा हो! ऐसे मे खुद परदा करना पडता है!! नवाज देवबंदी.
  • Log in or register to post comments
व
वात्रट गुरुवार, 04/15/2010 - 17:05 नवीन
लै भारी.... <<अश्फाक भाऊ, दर वेळेला प्रतिक्रिया देताच येत नाही मला तरी पण तुमचे हे शेर रोज मी वाट बघतो वाचण्यासाठी.>> असेच म्हणतो...
  • Log in or register to post comments
अ
अश्फाक Fri, 04/16/2010 - 08:27 नवीन
आपल्या सुचना आणि प्रतिक्रिया आमच्यासाठी अमुल्य आहेत, प्रतिक्षेत ......... १६-४-१० NRI special मुहाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं ! ( मुहाजिर = निर्वासीत ) तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आए हैं !! कहानी का ये हिस्सा आजतक सब से छुपाया है ! कि हम मिट्टी की ख़ातिर अपना सोना छोड़ आए हैं!! नई दुनिया बसा लेने की इक कमज़ोर चाहत में ! पुराने घर की दहलीज़ों को सूना छोड़ आए हैं !! अक़ीदत से कलाई पर जो इक बच्ची ने बाँधी थी ! ( अक़ीदत = विश्वास ) वो राखी छोड़ आए हैं वो रिश्ता छोड़ आए हैं !! किसी की आरज़ू ने पाँवों में ज़ंजीर डाली थी ! ( आरज़ू = इच्छा ) किसी की ऊन की तीली में फंदा छोड़ आए हैं!! ( ऊन की तीली = लोकर विनायची काडी / फंदा= टोक, छेडा ) पकाकर रोटियाँ रखती थी माँ जिसमें सलीक़े से! ( सलीक़े से= पद्ध्तशीर ) निकलते वक़्त वो रोटी की डलिया छोड़ आए हैं!! (डलिया = टोपली ) जो इक पतली सड़क उन्नाव से मोहान जाती है! ( उन्नाव, मोहान = यु.पी. मधील गाव ) वहीं हसरत के ख़्वाबों को भटकता छोड़ आए हैं!! ( हसरत = इच्छा ) यक़ीं आता नहीं, लगता है कच्ची नींद में शायद! हम अपना घर गली अपना मोहल्ला छोड़ आए हैं!! हमारे लौट आने की दुआएँ करता रहता है ! हम अपनी छत पे जो चिड़ियों का जत्था छोड़ आए हैं!! हमें हिजरत की इस अन्धी गुफ़ा में याद आता है! (हिजरत= स्थलांतर ) अजन्ता छोड़ आए हैं एलोरा छोड़ आए हैं!! सभी त्योहार मिलजुल कर मनाते थे वहाँ जब थे! दिवाली छोड़ आए हैं दशहरा छोड़ आए हैं!! हमें सूरज की किरनें इस लिए तक़लीफ़ देती हैं! अवध की शाम काशी का सवेरा छोड़ आए हैं!! गले मिलती हुई नदियाँ गले मिलते हुए मज़हब! (मज़हब = धर्म) इलाहाबाद में कैसा नज़ारा छोड़ आए हैं!! हम अपने साथ तस्वीरें तो ले आए हैं शादी की ! किसी शायर ने लिक्खा था जो सेहरा छोड़ आए हैं!! (सेहरा = लग्नात गायचे स्तुतीपर गीत) मुनव्वर राणा .
  • Log in or register to post comments
व
वाहीदा Fri, 04/16/2010 - 14:06 नवीन
मुगल सलतनत के आखरी शहंशाह बहादुर शाह ज़फ़र के लिखे हुए कुछ आखरी कलाम (जब उन्हे अंग्रेजी पुलीस पकडकर ले गयी ..) लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में किसकी बनी है आलमे-ना-पायदार में बुलबुल को बाग़बां से न सय्याद से गिला क़िस्मत में क़ैद थी लिखी फ़स्ले-बहार में कहदो इन हसरतों से कहीं और जा बसें इतनी जगह कहां है दिले दाग़दार में एक शाख़े-गुल पे बैठ के बुलबुल है शादमां कांटे बिछा दिए हैं दिले-लालज़ार में उम्रे-दराज़ मांग के लाए थे चार दिन दो आरज़ू में कट गए दो इंतिज़ार में दिन ज़िंदगी के ख़त्म हुए शाम हो गई फैला के पांव सोएंगे कुंजे मज़ार में कितना है बदनसीब ज़फ़र दफ़्न के लिए दो गज़ ज़मीं भी मिल न सकी कूए-यार में --बहादुर शाह ज़फ़र बतौर शमा के रोते इस अंजुमन से चले न बाग़बां ने इजाज़त दी सैर करने की खुशी से आए थे रोते हुए चमन से चले न मालो हकुमत न धन जायेगा. तेरे साथ बस एक कफन जायेगा. बचा भी न कोइ कि नोहा करे पारायों के कांधे बदन जायेगा. जिलावतनी ओढे तु सोता रहा, यादों में लिपटा गगन जायेगा मुल्क कि मिट्टी की चादर कहां,? जफर तु तो अब बे वतन जायेगा --बहादुर शाह ज़फ़र ~ वाहीदा
  • Log in or register to post comments
↩ प्रतिसाद: अश्फाक
म
मनिष Fri, 04/16/2010 - 09:11 नवीन
मुहाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं ! ( मुहाजिर = निर्वासीत ) तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आए हैं !! कहानी का ये हिस्सा आजतक सब से छुपाया है ! कि हम मिट्टी की ख़ातिर अपना सोना छोड़ आए हैं!! नई दुनिया बसा लेने की इक कमज़ोर चाहत में ! पुराने घर की दहलीज़ों को सूना छोड़ आए हैं !! अक़ीदत से कलाई पर जो इक बच्ची ने बाँधी थी ! ( अक़ीदत = विश्वास ) वो राखी छोड़ आए हैं वो रिश्ता छोड़ आए हैं !! किसी की आरज़ू ने पाँवों में ज़ंजीर डाली थी ! ( आरज़ू = इच्छा ) किसी की ऊन की तीली में फंदा छोड़ आए हैं!! ( ऊन की तीली = लोकर विनायची काडी / फंदा= टोक, छेडा ) पकाकर रोटियाँ रखती थी माँ जिसमें सलीक़े से! ( सलीक़े से= पद्ध्तशीर ) निकलते वक़्त वो रोटी की डलिया छोड़ आए हैं!! (डलिया = टोपली ) जो इक पतली सड़क उन्नाव से मोहान जाती है! ( उन्नाव, मोहान = यु.पी. मधील गाव ) वहीं हसरत के ख़्वाबों को भटकता छोड़ आए हैं!! ( हसरत = इच्छा ) यक़ीं आता नहीं, लगता है कच्ची नींद में शायद! हम अपना घर गली अपना मोहल्ला छोड़ आए हैं!! हमारे लौट आने की दुआएँ करता रहता है ! हम अपनी छत पे जो चिड़ियों का जत्था छोड़ आए हैं!! हमें हिजरत की इस अन्धी गुफ़ा में याद आता है! (हिजरत= स्थलांतर ) अजन्ता छोड़ आए हैं एलोरा छोड़ आए हैं!! सभी त्योहार मिलजुल कर मनाते थे वहाँ जब थे! दिवाली छोड़ आए हैं दशहरा छोड़ आए हैं!! हमें सूरज की किरनें इस लिए तक़लीफ़ देती हैं! अवध की शाम काशी का सवेरा छोड़ आए हैं!! गले मिलती हुई नदियाँ गले मिलते हुए मज़हब! (मज़हब = धर्म) इलाहाबाद में कैसा नज़ारा छोड़ आए हैं!! हम अपने साथ तस्वीरें तो ले आए हैं शादी की ! किसी शायर ने लिक्खा था जो सेहरा छोड़ आए हैं!! (सेहरा = लग्नात गायचे स्तुतीपर गीत) मुनव्वर राणा .
अंगावर काटा आहे आणि डोळे पाणावलेत. गुलजारच्या फाळणीच्या गोष्टी आठवल्या...सध्या तरी निशब्द! ही कविता/नज्म वापरेन मी कुठेतरी..जमेल तेव्हा! अतिशय संवेदनशील कविता. मला "ओ देस से आने वाले बता" आठवले...मी माझ्या ब्लॉगवर लिहीले होते त्याबद्द्ल - http://ramblings2reflections.wordpress.com/2007/09/07/o-des-se-aane-wale-bata/#comment-1355
  • Log in or register to post comments
अ
अश्फाक Fri, 04/16/2010 - 18:03 नवीन
नवाजिश , करम , शुक्रिया , इनायत .
  • Log in or register to post comments
व
वात्रट Fri, 04/16/2010 - 20:15 नवीन
काही शब्दांचे अर्थ कळत नाहीयेत..
  • Log in or register to post comments
अ
अश्फाक Sat, 04/17/2010 - 16:02 नवीन
१७-४-१० आते-आते मेरा नाम सा रह गया ! उस के होंठों पे कुछ काँपता रह गया!! वो मेरे सामने ही गया और मैं ! रास्ते की तरफ देखता रह गया !! झूठ वाले कहीं से कहीं बढ़ गये ! और मैं था कि सच बोलता रह गया!! आँधियों के इरादे तो अच्छे न थे! ये दिया कैसे जलता रह गया !! वसीम बरेलवी
  • Log in or register to post comments
म
मदनबाण Sat, 04/17/2010 - 16:08 नवीन
वाचनखुण म्हणुन हा धागा साठवला आहे... :) मदनबाण..... There is no need for temples, no need for complicated philosophies. My brain and my heart are my temples; my philosophy is kindness. Dalai Lama
  • Log in or register to post comments
अ
अश्फाक Sun, 04/18/2010 - 16:12 नवीन
१८-४-१० अब मै समझा तेरे रुखसार पे तिल का मतलब ! ( रुखसार = गाल ) दौलत-ए-हुस्न पे दरबान बिठा रखा है!! ( दरबान= पहारेकरी ) गर सियाह बख्त ही होना था नसीबो मे मेरे ! (गर = अगर्/जर , सियाह =काळा, बख्त= नशीब) जुल्फ होता तेरे रुखसार पे या तिल होता !! ( जुल्फ= केसांची बट , रुखसार = गाल ) गुमनाम.
  • Log in or register to post comments
अ
अश्फाक Mon, 04/19/2010 - 07:16 नवीन
१९-४-१० कब लोगों ने अल्फ़ाज़ के पत्थर नहीं फेंके ! ( अल्फ़ाज़= शब्द ) वो ख़त भी मगर मैंने जला कर नहीं फेंके !! ठहरे हुए पानी ने इशारा तो किया था ! कुछ सोच के खुद मैंने ही पत्थर नहीं फेंके!! क्या बात है उसने मेरी तस्वीर के टुकड़े ! घर में ही छुपा रक्खे हैं बाहर नहीं फेंके !! दरवाज़ों के शीशे न बदलवाइए नज़मी ! लोगों ने अभी हाथ से पत्थर नहीं फेंके !! अख़्तर नज़मी .
  • Log in or register to post comments
अ
अश्फाक Tue, 04/20/2010 - 16:28 नवीन
२०-४-१० ना सुपारी नजर आयी ना सरोता निकला ! ( सरोता = सुपारी कापायचे यंत्र ) मा के बटवे से दुवा निकली वजीफा निकला!! ( बटवा = खिसा,पाकिट / वजीफा = जप ) एक निवाले के लिये मैने जिसे मार दिया ! ( निवाला = घास ) वो परिन्दा भि कई रोज का भुका निकला !! मुनव्वर राणा .
  • Log in or register to post comments
ध
धमाल मुलगा Tue, 04/20/2010 - 16:40 नवीन
मस्त आहेत शेर. मला जास्त आवडतात ते फराझ आणि राशिद ह्यांचे शेर :) काय कातील दर्द असतं..
  • Log in or register to post comments
अ
अश्फाक Wed, 04/21/2010 - 07:03 नवीन
२१-४-१० तिफली मे सुना करते थे नानी से कहानी ! ( तिफली =बचपन ) बचपन है अगर शोख तो शोला है जवानी!! ( शोख = अवखळ ) जुडे मे सिमट आती है सावन की घटाये ! ( जुडा = केसांचा अंबाडा , सिमटना= एकत्र येणे ) खुल जाये अचानक तो बरस जाता है पानी!! सागर खय्यामी .
  • Log in or register to post comments
म
मनिष Wed, 04/21/2010 - 07:59 नवीन
एक निवाले के लिये मैने जिसे मार दिया ! ( निवाला = घास ) वो परिन्दा भि कई रोज का भुका निकला !! मुनव्वर राणा
अश्फाक भाई, तुमच्या ह्या लिखाणाने मी मुनव्वर राणांचा फॅन झालोय...त्यांच्याबद्दल अजून लिहाल का?
  • Log in or register to post comments
अ
अश्फाक गुरुवार, 04/22/2010 - 15:32 नवीन
२२-४-१० इसी गली में वो भूखा किसान रहता है! ये वो ज़मीन है जहाँ आसमान रहता है!! मैं डर रहा हूँ हवा से ये पेड़ गिर न पड़े! कि इस पे चिडियों का इक ख़ानदान रहता है!! सड़क पे घूमते पागल की तरह दिल है मेरा! हमेशा चोट का ताज़ा निशान रहता है !! तुम्हारे ख़्वाबों से आँखें महकती रहती हैं! तुम्हारी याद से दिल जाफ़रान रहता है !! (जाफ़रान = केसर ) हमें हरीफ़ों की तादाद क्यों बताते हो! ( हरीफ़ों की तादाद = साथीदारांची संख्या ) हमारे साथ भी बेटा जवान रहता है!! सजाये जाते हैं मक़तल मेरे लिये ‘राना’! ( मक़तल = कत्तलखाने ) वतन में रोज़ मेरा इम्तहान रहता है!! मुनव्वर राणा .
  • Log in or register to post comments
श
शुचि गुरुवार, 04/22/2010 - 15:44 नवीन
तुम्हारे ख़्वाबों से आँखें महकती रहती हैं! तुम्हारी याद से दिल जाफ़रान रहता है !! (जाफ़रान = केसर ) सुभानल्ला!!!! ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ Music and poetry only reach the ears of those in anguish.
  • Log in or register to post comments
च
चतुरंग गुरुवार, 04/22/2010 - 15:57 नवीन
चतुरंग
  • Log in or register to post comments
↩ प्रतिसाद: शुचि
अ
अश्फाक Fri, 04/23/2010 - 17:43 नवीन
२३-४-१० अँधेरे चारों तरफ़ सायं-सायं करने लगे! चिराग़ हाथ उठाकर दुआएँ करने लगे!! सलिका जिन को सिखाया था हम ने चलने का! ( सलिका = पध्दत ) वो लोग आज हमे दाये बाये करने लगे !! ( दाये बाये = उजवा डावा <दुर्लक्षित करने > ) तरक़्क़ी कर गए बीमारियों के सौदागर! ( बीमारियों के सौदागर = डोक्ट्र्र , दवाखाने ई. ) ये सब मरीज़ हैं जो अब दवाएँ करने लगे!! लहूलुहान पड़ा था ज़मीं पे इक सूरज! परिन्दे अपने परों से हवाएँ करने लगे!! ज़मीं पे आ गए आँखों से टूट कर आँसू! बुरी ख़बर है फ़रिश्ते ख़ताएँ करने लगे!! झुलस रहे हैं यहाँ छाँव बाँटने वाले! ( झुलस = झळ लागने ) वो धूप है कि शजर इलतिजाएँ करने लगे!! ( शजर= व्रुक्ष इलतिजाएँ = विनंती ) अजीब रंग था मजलिस का, ख़ूब महफ़िल थी ! ( मजलिस = सम्मेलन ) सफ़ेद पोश उठे काएँ-काएँ करने लगे!! ( सफ़ेद पोश = पांढरपेशे ) राहत इन्दौरी
  • Log in or register to post comments
अ
अश्फाक Sat, 04/24/2010 - 07:45 नवीन
२४-४-१० सियासत किस हुनरमंदी से सच्चाई छुपाती है ! ( सियासत = राजकारण , हुनरमंदी = खुबीने ) जैसे सिसकियो का जख्म शहनाइ छुपाती है !! जो ईस की तह मे जाता है वापस नही आता! ( तह = तळ ) नदी हर तैरने वाले से गहराइ छुपाती है !! ये बच्ची चाहती है और कुछ दिन मा को खुश रखना! ये कपडो की मदद से अपनी लम्बाई छुपाती है !! मुनव्वर राणा .
  • Log in or register to post comments
आ
आवडाबाई Sat, 04/24/2010 - 15:18 नवीन
क्या बात है उसने मेरी तस्वीर के टुकड़े ! घर में ही छुपा रक्खे हैं बाहर नहीं फेंके !! दरवाज़ों के शीशे न बदलवाइए नज़मी ! लोगों ने अभी हाथ से पत्थर नहीं फेंके !! खूपच सह्ही
  • Log in or register to post comments
अ
अश्फाक Sun, 04/25/2010 - 14:31 नवीन
२५-४-१० आँख से अश्क़ भले ही न गिराया जाये ! ( अश्क़ = आसु ) पर मेरे गम को हँसी में न उड़ाया जाये !! तू समंदर है मगर मैं तो नहीं हूँ दरिया ! ( दरिया = नदी ) किस तरह फ़िर तेरी दहलीज़ पे आया जाये !! दो कदम आप चलें तो मैं चलूँ चार कदम ! मिल तो सकते हैं अगर ऐसे निभाया जाये !! मुझे पसंद है खिलता हुआ, टहनी पे गुलाब ! उसकी जिद है कि वो, जुड़े में सजाया जाये !! मेरे जज़्बात ग़लत, मेरी हर इक बात ग़लत ! ( जज़्बात = भावना ) ये सही तो है मगर कितना जताया जाये !! लाख अच्छा सही वो फूल मगर मुरदा है ! कब तलक उसको किताबों में दबाया जाये !! रोशनी तुमको उधारी में भी मिल जायेगी ! पर मज़ा तब है कि, जब घर को जलाया जाये ! ललित मोहन त्रिवेदी
  • Log in or register to post comments
अ
अश्फाक Mon, 04/26/2010 - 07:44 नवीन
आपल्या सुचना आणि प्रतिक्रिया आमच्यासाठी अमुल्य आहेत, प्रतिक्षेत ......... २६-४-१० सोचा नहीं अच्छा बुरा देखा सुना कुछ भी नहीं! मांगा ख़ुदा से रात दिन तेरे सिवा कुछ भी नहीं!! सोचा तुझे, देखा तुझे चाहा तुझे मांगा तुझे ! मेरी वफ़ा मेरी ख़ता, तेरी ख़ता कुछ भी नहीं!! जिस पर हमारी आँख ने मोती बिछाये रात भर! भेजा वही काग़ज़ उसे हमने लिखा कुछ भी नहीं!! इक शाम की दहलीज़ पर बैठे रहे वो देर तक! आँखों से की बातें बहुत मुँह से कहा कुछ भी नहीं!! दो चार दिन की बात है दिल ख़ाक में सो जायेगा! जब आग पर काग़ज़ रखा बाकी बचा कुछ भी नहीं!! अहसास की ख़ुश्बू कहाँ आवाज़ के जुगनू कहाँ! ख़ामोश यादों के सिवा घर में रहा कुछ भी नहीं!!
  • Log in or register to post comments
श
शुचि Mon, 04/26/2010 - 17:20 नवीन
अहसास की ख़ुश्बू कहाँ आवाज़ के जुगनू कहाँ! ख़ामोश यादों के सिवा घर में रहा कुछ भी नहीं!! फारच गोड!!! ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ विश्वच अवघे ओठा लावून, कुब्जा प्याली तो मुरलीरव डोळ्यांमधुनी थेंब सुखाचे, हे माझ्यास्तव..हे माझ्यास्तव
  • Log in or register to post comments
↩ प्रतिसाद: अश्फाक
अ
अश्फाक Tue, 04/27/2010 - 07:13 नवीन
२७-४-१० न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाये ..... कभी तो आसमाँ से चांद उतरे जाम हो जाये! (जाम = प्याला) तुम्हारे नाम की इक ख़ूबसूरत शाम हो जाये!! हमारा दिल सवेरे का सुनहरा जाम हो जाये ! चराग़ों की तरह आँखें जलें जब शाम हो जाये!! अजब हालात थे यूँ दिल का सौदा हो गया आखिर! (अजब = विचित्र ) मोहबात की हवेली जिस तरह नीलाम हो जाये !! समंदर के सफ़र में इस तरह आवाज़ दो हमको! हवायेँ तेज़ हों और कश्तियों में शाम हो जाये!! मैं एहतियातन उस गली से कम गुज़रता हूँ! ( एहतियातन = काळ्जीपुर्वक ) कोई मासूम क्यों मेरे लिये बदनाम हो जाये !! मुझे मालूम है उस का ठिकाना फिर कहाँ होगा! परिंदा आसमाँ छूने में जब नाक़ाम हो जाये !! उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो ! न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाये!! --बशीर बद्र
  • Log in or register to post comments
अ
अश्फाक Wed, 04/28/2010 - 16:14 नवीन
साहिल पे समन्दर के खजाने नहि आते! होटो पे मोहोब्बत के फसाने नहि आते!! सोते मे चमक उठति है पलके हमारी! आन्खो को अब ख्वाब छुपाने नही आते.!! ` ( पुर्वप्रकाशीत २७-३-१० ला ) पुढे ........ दिल उजड़ी हुई इक सराये की तरह है! ( सराये = धर्मशाला ) अब लोग यहाँ रात जगाने नहीं आते!! उड़ने दो परिंदों को अभी शोख़ हवा में! ( शोख़ = अवखळ ) फिर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते!! इस शहर के बादल तेरी ज़ुल्फ़ों की तरह हैं! ( ज़ुल्फ़ों = केस ) ये आग लगाते हैं बुझाने नहीं आते!! अहबाब भी ग़ैरों की अदा सीख गये हैं! ( अहबाब = दोस्त ) आते हैं मगर दिल को दुखाने नहीं आते...!!
  • Log in or register to post comments
अ
अश्फाक गुरुवार, 04/29/2010 - 16:08 नवीन
आपल्या सुचना आणि प्रतिक्रिया आमच्यासाठी अमुल्य आहेत, प्रतिक्षेत ......... २९-४-१० इतना मत चाहो उसे वो बेवफा हो जायेगा ............ सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जायेगा! इतना मत चाहो उसे वो बेवफा हो जायेगा !! हम भी दरिया हैं अपना हुनर मालूम है ! जिस तरफ भी चले जायेंगे रास्ता हो जायेगा !! इतनी सचाई से मुझसे जिंदगी ने कह दिया ! तू नहीं मेरा तो कोई दूसरा हो जायेगा !! मै खुदा का नाम लेकर पी रहा हूँ दोस्तों ! जहर भी अगर इसमें होगा दवा हो जायेगा !! सब उसी के हैं हवा खुशबू ज़मीनों आसमान ! मै जहाँ भी जाऊंगा उसे पता हो जायेगा !! dr.bashir badar
  • Log in or register to post comments
श
शुचि गुरुवार, 04/29/2010 - 16:30 नवीन
वा! काय तडफ काय आत्मविश्वास आहे या शेरांमधे. मस्त!! ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ विश्वच अवघे ओठा लावून, कुब्जा प्याली तो मुरलीरव डोळ्यांमधुनी थेंब सुखाचे, हे माझ्यास्तव..हे माझ्यास्तव
  • Log in or register to post comments
↩ प्रतिसाद: अश्फाक
अ
अश्फाक Fri, 04/30/2010 - 08:25 नवीन
आपल्या सुचना आणि प्रतिक्रिया आमच्यासाठी अमुल्य आहेत, प्रतिक्षेत ......... क़द में छोटे हों मगर लोग बड़े रहते हैं........... ३०-४-१० उन घरों में जहाँ मिट्टी के घड़े रहते हैं! क़द में छोटे हों मगर लोग बड़े रहते हैं!! जो भी दौलत थी वो बच्चों के हवाले कर दी! जब तलक मैं नहीं बैठूँ ये खड़े रहते हैं !! मैंने फल देख के इन्सानों को पहचाना है! जो बहुत मीठे हों अंदर से सड़े रहते हैं!! मुनव्वर राणा .
  • Log in or register to post comments
अ
अश्फाक Sat, 05/01/2010 - 17:56 नवीन
१-५-१० आज फिर कोई भूल की जाए......... दोस्ती जब किसी से की जाए ! दुश्मनों की भी राए ली जाए !! मौत का ज़हर है फ़िज़ाओं में ! (फ़िज़ाओं = हवाये ) अब कहां जा के सांस ली जाए !! मेरे माज़ी के ज़ख्म भरने लगे ! आज फिर कोई भूल की जाए !! बोतलें खोल के तो पी बरसों ! आज दिल खोल के भी पी जाए !! राहत इन्दौरी
  • Log in or register to post comments
अ
अश्फाक Sun, 05/02/2010 - 18:18 नवीन
२-५-१० हमारे कुछ गुनाहों की सज़ा भी साथ चलती है ! हम अब तन्हा नहीं चलते दवा भी साथ चलती है!! ( तन्हा=एकटे ) अभी ज़िन्दा है माँ मेरी मुझे कुछ हो नही सकता ! मैं जब घर से निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है!! मुनव्वर राणा .
  • Log in or register to post comments
अ
अश्फाक Mon, 05/03/2010 - 16:38 नवीन
३-५-१० राना कभी शाहों की ग़ुलामी नहीं करता......... हम दोनों में आँखें कोई गीली नहीं करता! ग़म वो नहीं करता है तो मैं भी नहीं करता!! मौक़ा तो कई बार मिला है मुझे लेकिन! मैं उससे मुलाक़ात में जल्दी नहीं करता!! वो मुझसे बिछड़ते हुए रोया नहीं वरना! दो चार बरस और मैं शादी नहीं करता!! वो मुझसे बिछड़ने को भी तैयार नहीं है! लेकिन वो बुज़ुर्गों को ख़फ़ा भी नहीं करता!! ( बुज़ुर्गों = वडिलधारे, ख़फ़ा = नाराज ) ख़ुश रहता है वो अपनी ग़रीबी में हमेशा! ‘राना’ कभी शाहों की ग़ुलामी नहीं करता!! ( शाह = बादशाह ) मुनव्वर राना .
  • Log in or register to post comments
श
शुचि Mon, 05/03/2010 - 17:15 नवीन
हम दोनों में आँखें कोई गीली नहीं करता! ग़म वो नहीं करता है तो मैं भी नहीं करता!! मौक़ा तो कई बार मिला है मुझे लेकिन! मैं उससे मुलाक़ात में जल्दी नहीं करता!! किती हा निग्रह! प्रेमात "शरणभाव" महत्त्वाचा हे दोघंही जाणत नाहीत जणू. दोघंही तोडीसतोड मानी आहेत. ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ विश्वच अवघे ओठा लावून, कुब्जा प्याली तो मुरलीरव डोळ्यांमधुनी थेंब सुखाचे, हे माझ्यास्तव..हे माझ्यास्तव
  • Log in or register to post comments
↩ प्रतिसाद: अश्फाक
अ
अश्फाक Wed, 05/05/2010 - 18:32 नवीन
५-५-१० अंजाम उसके हाथ है आगाज कर के देख ! ( शेवट परमेश्वराच्या हातात आहे , सुरवात करुन तर बघ ) भिगे हुए परो से ही परवाज कर के देख !! ( चिंब भिजलेल्या पंखांनी उडुन तर बघ ) नवाज देवबंदी .
  • Log in or register to post comments
अ
अश्फाक Fri, 05/07/2010 - 18:18 नवीन
७-५-१० जहा तक हो सके हमने तुम्हे परदा कराया है ! मगर ऐ आसुओ तुम ने बडा रुसवा कराया है !! ( रुसवा = बदनाम ) चमक ऐसे नही आती है, खुद्दारी कि, चेहरे पर ! ( खुद्दारी = आत्मनिर्भरता ) अना को हम ने दो दो वक्त का फाका कराया है !! ( अना = आत्मसन्मान / फाका = उपासमार) मुनव्वर राना .
  • Log in or register to post comments
अ
अश्फाक Sat, 05/08/2010 - 16:32 नवीन
८-५-१० पहलु मे दिल बदलता है, पहलु संभालिये! ( पहलु मे = बगल मधे/बाजुला ) मेहफील मे आता है कोइ दस्त-ए-हिना लिये!! ( दस्त-ए-हिना= मेहंदी लावलेले हाथ ) तबअं(न) मेरी नजर बुरी नही मगर हुजुर ! ( तबअं(न)= पिंडाने , स्वाभावाने / तबीयतने ) कुछ आप भी तो अपनी नजर को संभालिये!! गुमनाम.
  • Log in or register to post comments
अ
अश्फाक Wed, 05/12/2010 - 16:26 नवीन
आपल्या सुचना आणि प्रतिक्रिया आमच्यासाठी अमुल्य आहेत, प्रतिक्षेत ......... १२-५-१० बीमार को मर्ज़ की दवा देनी चाहिए! वो पीना चाहता है पिला देनी चाहिए!! अल्लाह बरकतों से नवाज़ेगा इश्क़ में! ( बरकतों से = क्रुपा ज्याने वाढेल ) है जितनी पूँजी पास लगा देनी चाहिए!! ये दिल किसी फ़कीर के हुज़रे से कम नहीं! ये दुनिया यही पे लाके छुपा देनी चाहिए!! मैं फूल हूँ तो फूल को गुलदान हो नसीब! ( गुलदान= flowerpot ) मैं आग हूँ तो आग बुझा देनी चाहिए!! मैं ख़्वाब हूँ तो ख़्वाब से चौंकाईये मुझे! मैं नीद हूँ तो नींद उड़ा देनी चाहिए!! मैं जब्र हूँ तो जब्र की ताईद बंद, हो!! ( जब्र= जोरजबरदस्ती , ताईद = समर्थन ) मैं सब्र हूँ तो मुझ को दुआ देनी चाहिए!! मैं ताज हूँ तो ताज को सर पे सजायें लोग! मैं ख़ाक हूँ तो ख़ाक उड़ा देनी चाहिए!! सच बात , कौन है जो सरे-आम कह सके ? मैं कह रहा हूँ , मुझको सजा देनी चाहिए !! सौदा यही पे होता है हिन्दोस्तान का ! संसद भवन में आग लगा देनी चाहिए!! राहत इन्दोरी .
  • Log in or register to post comments
अ
अश्फाक Tue, 05/18/2010 - 18:13 नवीन
१८-५-१० यह एहतराम तो करना ज़रूर पड़ता है! (एहतराम करना = मान ठेवने.) जो तू ख़रीदे तो बिकना ज़रूर पड़ता है!! बड़े सलीक़े से यह कह के ज़िन्दगी गुज़री! ( सलीक़े से = पद्धत्शीर ) हर एक शख़्स को मरना ज़रूर पड़ता है!! ( शख़्स = व्यक्ती ) वो दोस्ती हो मुहब्बत हो चाहे सोना हो! कसौटियों पे परखना ज़रूर पड़ता है!! कभी जवानी से पहले कभी बुढ़ापे में! ख़ुदा के सामने झुकना ज़रूर पड़ता है!! हो चाहे जितनी पुरानी भी दुश्मनी लेकिन! कोई पुकारे तो रुकना ज़रूर पड़ता है!! वफ़ा की राह पे चलिए मगर ये ध्यान रहे! की दरमियान में सहरा ज़रूर पड़ता है.!! ( सहरा = वाळवंट ) मुनव्वर राना.
  • Log in or register to post comments
अ
अश्फाक Fri, 05/21/2010 - 18:03 नवीन
२१-५-१० मोअतबर दिल को तेरी याद बना देती है! ( मोअतबर= विश्वसनिय ) आशिकी फूल को फरहाद बना देती है !! ( तुझी आठवन आली की ह्रद्याला शान्ती,विश्वास वाटतो ) ( प्रेमात काय जादु आहे कोन जाने ? जे फुला सारख्या नाजुक व्यक्तीला फरहाद सारखे खंबिर बनवते ) पुरशिकम लोग जंग नही लडा करते ! ( पुरशिकम = पोट भरलेले ) भुक इन्सान को फौलाद बना देती है!!
  • Log in or register to post comments
अ
अश्फाक गुरुवार, 06/03/2010 - 16:49 नवीन
३-६-१० अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको! मैं हूँ तेरा नसीब अपना बना ले मुझको!! मुझसे तू पूछने आया है वफ़ा के मानी! ( मानी = अर्थ ) ये तेरी सादा दिली मार न डाले मुझको !! तूने देखा नहीं आईने से आगे कुछ भी! ख़ुदपरस्ती में कहीं तू न गँवा ले मुझको!! ( ख़ुदपरस्ती = स्वत ला पुजने ) कल की बात और है मैं अब सा रहूँ या न रहूँ! जितना जी चाहे तेरा आज सता ले मुझको!! ख़ुद को मैं बाँट न डालूँ कहीं दामन-दामन! कर दिया तूने अगर मेरे हवाले मुझको!! मैं जो काँटा हूँ तो चल मुझसे बचाकर दामन! मैं हूँ गर फूल तो जूड़े में सजा ले मुझको!! तर्क-ए-उल्फ़त की क़सम भी कोई होती है क़सम! ( तर्क-ए-उल्फ़त = प्रेम तर्क करने ) तू कभी याद तो कर भूलने वाले मुझको!! वादा फिर वादा है मैं ज़हर भी पी जाऊँ "क़तील"! शर्त ये है कोई बाँहों में सम्भाले मुझको!! कतिल शिफाइ
  • Log in or register to post comments
अ
अश्फाक Wed, 06/23/2010 - 18:52 नवीन
२३-६-१० मै बताउ फर्क नासेह जो है तुझ मे और मुझ मे! ( नासेह = नसिहत्/सल्ला देनारे ) मेरि जिन्दगी तलातुम तेरि जिन्दगी किनारा !! ( तलातुम = तुफान ) मै यु हि रवा-दवा था किसि बहर-ए-बेकरा(र) मे! ( रवा-दवा = भरकटलेला , बहर-ए-बेकरा = अशात समुद्र ) किसि प्यार कि सदा ने मुझे दुर से पुकारा!! ( सदा = पुकारा ) प्यार के मोड पर मिल गये हो अगर !, यु हि मिलने मिलाने का वादा करो !! हम ने माना मोहब्बत का दस्तुर है ! ( दस्तुर = पध्दत ) हुस्न कि हर अदा हम को मन्जुर है!! रुठना है जरुरी तो रुठो मगर! बाद मे मान जाने का वादा करो!!
  • Log in or register to post comments
अ
अश्फाक Tue, 09/28/2010 - 16:38 नवीन
मला माझा हा धागा सम्पादित करता येत नहिये.... काय करु ?
  • Log in or register to post comments
व
विलासराव Tue, 09/28/2010 - 17:26 नवीन
एकापेक्षा एक सुरेख शेर आहेत. खुप आवडले.
  • Log in or register to post comments
अ
अश्फाक Tue, 07/26/2011 - 16:15 नवीन
२६-०७-११ ज़िन्दगी से यही गिला है मुझे ! ( गिला = तक्रार ) तू बहुत देर से मिला है मुझे !! हमसफ़र चाहिये हुजूम नहीं ! ( सहप्रवासी हवा गर्दी नको ) इक मुसाफ़िर भी काफ़िला है मुझे !! तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल ! हार जाने का हौसला है मुझे !! लब कुशां हूं तो इस यकीन के साथ ! ( लब कुशां = तोंड उघडने ) कत्ल होने का हौसला है मुझे !! दिल धडकता नहीं सुलगता है ! वो जो ख्वाहिश थी, आबला है मुझे!! ( आबला = छाला ) कौन जाने कि चाहतो में फ़राज़ ! क्या गंवाया है क्या मिला है मुझे!! अहमद फराझ.
  • Log in or register to post comments
अ
अश्फाक गुरुवार, 09/29/2016 - 18:38 नवीन
अलमारी से ख़त उसके पुराने निकल आए फिर से मेरे चेहरे पे ये दाने निकल आए माँ बैठ के तकती थी जहाँ से मेरा रस्ता मिट्टी के हटाते ही ख़ज़ाने निकल आए मुमकिनहै हमें गाँव भी पहचान न पाए बचपन में ही हम घर से कमाने निकल आए बोसीदा* किताबों के वरक़* जैसे हैं हम लोग जब हुक्म दिया हमको कमाने निकल आए ऐ रेत के ज़र्रे* तेरा एहसान बहुत है आँखों को भिगोने के बहाने निकल आए अब तेरे बुलाने से भी आ नहीं सकतेl हम तुझसे बहुत आगे ज़माने निकल आए एक ख़ौफ़-सा रहता है मेरे दिल में हमेशा किस घर से तेरी याद न जाने निकल आए * बोसीदा – पुरानी * वरक़ – पन्ने * ज़र्रे – कण
  • Log in or register to post comments
  • «
  • ‹
  • 1
  • 2
मिसळपाव.कॉम बद्दल
  • 1आम्ही कोण?
  • 2Disclaimer
  • 3Privacy Policy
नवीन सदस्यांकरीता
  • 1सदस्य व्हा
  • 2नेहमीचे प्रश्न व उत्तरे
लेखकांसाठी
  • 1लेखकांसाठी मार्गदर्शन उपलब्ध
  • 2लेखन मार्गदर्शन
संपर्क
  • 1सर्व मराठीप्रेमींचे मनापासून स्वागत!
  • 2अभिप्राय द्या
  • 3संपर्क साधा
© 2026 Misalpav.com  ·  Disclaimer  ·  Privacy Policy मराठी साहित्य व संस्कृतीसाठी  ·  प्रवेश  |  सदस्य व्हा