आई
💬 प्रतिसाद
(6)
प
पक्या
Sun, 05/09/2010 - 11:06
नवीन
कविता चांगली आहे.
जय महाराष्ट्र , जय मराठी !
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भ
भारद्वाज
Mon, 05/10/2010 - 08:06
नवीन
छान ...अजून येवू देत....
"मूल रडल्यावर जिला आयुष्यात एकदाच आनंद होतो ती म्हणजे आई"- ए.पी.जे. अब्दुल कलाम
मातृदेवो भव
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प
प्राजु
Sun, 05/09/2010 - 16:49
नवीन
सुरेख!!
:)
- (सर्वव्यापी)प्राजक्ता
http://www.praaju.net/
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व
वाहीदा
Sun, 05/09/2010 - 18:20
नवीन
लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती
बस एक मां है जो कभी ख़फ़ा नहीं होती ।।
इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है ,
मां बहुत गुस्से में होती है तो रो देती है |
मेरी ख्वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊं,
मां से इस तरह लिपटूं कि बच्चा हो जाऊं ।।
जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है ,
मां दुआ करती है, ख्वाब में आ जाती है ।।
जब से गई है माँ मेरी रोया नहीं,
बोझिल हैं पलकें फिर भी मैं सोया नहीं ।
साया उठा है माँ का मेरे सर से जब,
सपनों की दुनिया में कभी खोया नहीं ।
सुख देती हुई मांओं को गिनती नहीं आती
पीपल की घनी छायों को गिनती नहीं आती।
किसी को घर मिला तो किसी के हिस्से में दुकान आयी,
मैं घर में सबसे छोटा था मेरे हिस्से में माँ आयी |
-- मुनव्वर राणा
~ वाहीदा
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S
sur_nair
Mon, 05/10/2010 - 03:57
नवीन
क्या कहने. बहोत बढ़िया वहीदाजी.
पंचमजी, प्रयत्न छान आहे.
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व
विमुक्त
Mon, 05/10/2010 - 10:11
नवीन
सुंदर कविता...
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