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आदाब अर्ज है !

अ — अश्फाक, Mon, 12/13/2010 - 16:42

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2934 वाचन

💬 प्रतिसाद (8)
ग
गणेशा Mon, 12/13/2010 - 18:06 नवीन
मुहाजिरांचे दु:खद मन गझलकाराणे अतिषय उत्कृष्ठ पणे येथे मांडले आहे. त्याच्या मनाची व्यथा .. संवेदना शब्दा शब्दात जाणवते आहे.. --- >> अक़ीदत से कलाई पर जो इक बच्ची ने बाँधी थी ! वो राखी छोड़ आए हैं वो रिश्ता छोड़ आए हैं !! किसी की आरज़ू ने पाँवों में ज़ंजीर डाली थी ! किसी की ऊन की तीली में फंदा छोड़ आए हैं!! <<-- हे तर वाचुन मन सुन्न झाले , फाळणीच्या वेळेस निर्वासित होउन चेहरा हरवलेल्या माणसांच्या वेदना आठवुनच मन हेलावुन गेले. मिट्टी के लिये सोना छोड आये हे तर मनाला चटका लावुन गेले. माहाजिर पाकिस्थानी असो वा भारतीय त्याचे दु:ख सेमच ... अश्फाक भाउ .. येवुद्या आनखिन गझल्स .. अवांतर : १. आपल्या या गझल मुळे .. माझे मित्र श्री. विजय कणसे यांची निर्वासितांवरील एक कविता आठवली .. आता माझ्याजवळ नाही .. पण जेंव्हा देयीन तेंव्हा नक्की सांगेन .. --------------
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आ
आंसमा शख्स Tue, 12/14/2010 - 05:07 नवीन
यक़ीं आता नहीं, लगता है कच्ची नींद में शायद! हम अपना घर गली अपना मोहल्ला छोड़ आए हैं!! हमारे लौट आने की दुआएँ करता रहता है ! हम अपनी छत पे जो चिड़ियों का जत्था छोड़ आए हैं!! हमें हिजरत की इस अन्धी गुफ़ा में याद आता है! (हिजरत= स्थलांतर ) अजन्ता छोड़ आए हैं एलोरा छोड़ आए हैं!! सभी त्योहार मिलजुल कर मनाते थे वहाँ जब थे! दिवाली छोड़ आए हैं दशहरा छोड़ आए हैं!! हमें सूरज की किरनें इस लिए तक़लीफ़ देती हैं! अवध की शाम काशी का सवेरा छोड़ आए हैं!! गले मिलती हुई नदियाँ गले मिलते हुए मज़हब! (मज़हब = धर्म) इलाहाबाद में कैसा नज़ारा छोड़ आए हैं!!
फार आवडले. अजून गझला प्रतिसादात नको. कृपया प्रत्येक गझल वेगळी द्याल का?
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ग
गणेशा Tue, 12/14/2010 - 09:12 नवीन
अजून गझल्स प्रतिसादात नको. कृपया प्रत्येक गझल वेगळी द्याल का? माझे ही हेच म्हणने आहे. हवे तर प्रत्येक गझल्स च्या आधी .. मागच्या गझल्स ची लिंक देत रहायची .. आपोआप सर्व गझल्स लिंक नुसार ओपन करता येतील ...
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↩ प्रतिसाद: आंसमा शख्स
प
पाषाणभेद Tue, 12/14/2010 - 05:14 नवीन
क्या बात है | एकएक कडवे मस्त आहे.
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ट
टारझन Tue, 12/14/2010 - 09:16 नवीन
शेर्-ओ-शायरीत एवढी गती नाही ... पण तरीही षिर्षक वाचुन एक जुणा फेमस शेर आठवला .. पुर्ण देता येणार नाही ... उरलेला आपापला आठवुन घेने. रोज कहती हो आदाब आदाब ... गौर फर्माईयेगा .. रोज कहती है आदाब आदाब .. ...................... बुरा मान गये ? - इर्शादराव शेरकर
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अ
अश्फाक Tue, 12/14/2010 - 16:42 नवीन
१४-१२-१० लोग हर मोड़ पे रुक रुक के सम्भलते क्यूँ हैं ! इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यूँ हैं !! मैं न जुगनू हूँ दिया हूँ न कोई तारा हूँ ! रौशनी वाले मेरे नाम से जलते क्यूँ हैं !! नीन्द से मेरा ताअल्लुक़ ही नहीं बरसों से ! ( ताअल्लुक़ = संबंध ) ख़्वाब आ आ के मेरी छत पे टहलते क्यूँ हैं !! मोड़ होता है जवानी का सम्भलने के लिये ! और सब लोग यहीं आके फिसलते क्यूँ हैं !! राहत इंदोरी .
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अ
अश्फाक Wed, 12/15/2010 - 14:23 नवीन
१५-१२-१० हमारा दिल सवेरे का सुनहरा जाम हो जाए ! ( सुनहरा जाम= सोनेरि प्याला ) चराग़ों की तरह आँखें जलें, जब शाम हो जाए!! मैं ख़ुद भी एहतियातन, उस गली से कम गुजरता हूँ ( एहतियातन = काळजीपुर्वक ) कोई मासूम क्यों मेरे लिए, बदनाम हो जाए !! समन्दर के सफ़र में इस तरह आवाज़ दो हमको! हवायें तेज़ हों और कश्तियों में शाम हो जाए !! मुझे मालूम है उसका ठिकाना फिर कहाँ होगा! परिंदा आस्माँ छूने में जब नाकाम हो जाए !! उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो! न जाने किस गली में, ज़िंदगी की शाम हो जाए!! बशिर बद्र.
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उ
उल्हास Wed, 12/15/2010 - 16:57 नवीन
अहो एकेकाचा निवांतपणे आस्वाद घेवु द्या अप्रतिम
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