नवरत्नहार
💬 प्रतिसाद
(5)
र
राघव
Sat, 12/18/2010 - 21:41
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छानच! द्विजत्व शब्दाचा उपयोग खूप छान. आवडेश!
बादवे,
अनन्य भावाने शरण। येता मज लीनपण। आले अहंतेसी मरण। भक्तीयोगे ॥
तव कृपा ठरे सार्थ। प्रकटला गीतेचा भावार्थ। प्रपंच आणि परमार्थ। सहज साध्य ॥
नुरले मायेचे ममत्व। चित्ती साधले समत्व। मज लाभले द्विजत्व। योग बळे ॥
कधी वेदनांचा चारा। कधी भोगांचा पसारा। खेळ प्रारब्धाचा सारा। लीलामात्र ॥
घेता स्वरूपाचा निदीध्यास। लोपे जगाचा आभास। चाले 'सोहम' विनायास। अखण्डत्वे ॥
पिंडे पिंडासी ग्रासले। पिंडी ब्रह्मांड कोंडले। अवघे अस्तित्व जाहले। ब्रह्ममय ॥
या ओळी मुमुक्षुअवस्थेच्या आहेत! अत्त्युच्च साधकाच्या! ;)
राघव
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अ
अवलिया
Sun, 12/19/2010 - 06:17
नवीन
__/\__
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S
sneharani
Mon, 12/20/2010 - 11:49
नवीन
मस्तच!!
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प
परिकथेतील राजकुमार
Mon, 12/20/2010 - 11:55
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मस्त :)
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प
प्राजु
Mon, 12/20/2010 - 17:38
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नितांत सुंदर!!
अतिशय सुंदर!! याला खरंच कोणीतरी चाल लावून गाइल काय? :)
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