एक भिंत येथे होती
आज माझ्या गावचा | रस्ता उदास वाटला | वेशीतल्या कमानीचा | खांब का हा वाकला ||१||
एक कामधेनू होती | इवल्याशा आठवांत | दावे भकास आज | भिजले गं आसवात ||२ ||
काळ्या आईस नाही | काळ्या ढगाची भेट | थरथरणा-या मनात | रणरणते ऊन थेट ||३||
एक भिंत येथे होती | उन्हामध्येही ओली | मातीत शुष्क भेग | पडवीत रुंद झाली ||४||
ओठांत आज नाही | हक्काचे एक हासू | आई महागले गं | डोळ्यांतलेही आसू ||५||
- संध्या
०६ मार्च २०१३
💬 प्रतिसाद
(10)
म
मिसळलेला काव्यप्रेमी
Wed, 03/06/2013 - 06:27
नवीन
__/\__
परत एकदा एक रेखिव रचना.
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अ
अत्रुप्त आत्मा
Wed, 03/06/2013 - 06:52
नवीन
1
आणी...
एक भिंत येथे होती | उन्हामध्येही ओली | मातीत शुष्क भेग | पडवीत रुंद झाली|| >>> या साठी __/\__
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च
चाणक्य
Wed, 03/06/2013 - 06:36
नवीन
आवडली
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ह
हासिनी
Wed, 03/06/2013 - 06:42
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सुंदर! आवडली!!
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व
वेल्लाभट
Wed, 03/06/2013 - 06:47
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अ प्र ति म !
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फ
फिझा
Wed, 03/06/2013 - 07:05
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छान कविता !!
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स
सांजसंध्या
Fri, 03/08/2013 - 12:32
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सर्वांचे आभार
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प
पैसा
Fri, 03/08/2013 - 15:00
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आवडली.
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ज
जेनी...
Fri, 03/08/2013 - 18:14
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:)
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स
सुधीर
Sat, 03/09/2013 - 09:32
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आवडली!
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