अरूप
अरूप उमजोनी जाय,
दाविते पंथ गुरुमाय,
अज्ञान विलया जाय,
तत्काले...
जन्मोजन्मीच्या ग्रंथी,
पाडिती जीवा गुंथी,
गुरुस्पर्शे निघे पंथी,
मुक्तीचिया...
सर्व स्थळी सर्व देही,
एकतत्व निश्चये पाही,
नित्यानुसंधानी राही,
आत्ममग्न...
फिटता भ्रमजाल,
जेथे तेथे पाहाल,
एकत्व अनुभवाल,
चित्शक्तीचे...
- सागरलहरी -
२३.११.२०१३
💬 प्रतिसाद
(12)
ज
जेनी...
Sat, 11/23/2013 - 05:12
नवीन
छान , प्रसन्न काव्य .
आवडलं
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स
सस्नेह
Sat, 11/23/2013 - 05:51
नवीन
+१
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य
यशोधरा
Sat, 11/23/2013 - 06:02
नवीन
सुरेख.
सुंदर..
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प
प्यारे१
Sat, 11/23/2013 - 08:41
नवीन
छानच!
(ग्रंथी म्हणजे गाठी ना?)
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स
सागरलहरी
Sun, 11/24/2013 - 06:16
नवीन
होय ग्रन्थी = गाठ
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अ
अमेय६३७७
Sat, 11/23/2013 - 07:14
नवीन
सुरेख
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अ
अत्रुप्त आत्मा
Sat, 11/23/2013 - 08:48
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खूप छान!
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व
वेल्लाभट
Sat, 11/23/2013 - 12:30
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छान.....
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म
मदनबाण
Sun, 11/24/2013 - 05:07
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छम्न. :)
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स
सागरलहरी
Tue, 11/26/2013 - 06:35
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आपणा सर्वाना मनापासुन धन्यवाद
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म
मिसळलेला काव्यप्रेमी
Tue, 11/26/2013 - 08:10
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अतिशय सुंदर __/\__!!
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आ
आतिवास
Tue, 11/26/2013 - 15:08
नवीन
सुरेख!
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