भीड......
पता नही था कि दिन भर गये है। चलो बुलावा आया है,यमदूत आये , उसे चलने के लिए बोले। बंदा बोला जनाब इतनी भी क्या जल्दी है। अभी आये हो मेहमान नवाजी तो करने दो। जिंदगी मे एक बार ही आते हो। खातीर तवाजा करना हमारी फितरत है। यमदूत बोले हमे उल्लू मत बनाओ। जिस शाख पर तुम बैठे हो कुछ दिन पहले वो हमारी थी। हमे पता था तुम कहां होंगे इसलीये हमारी ड्युटी लगी है। जब रियायत हमे नही मिली तो तुम्हे क्यू? बंदा बडा चालाक था। बोला ग्रांही (गाववाला) बोलते हो, तो कुछ फर्ज निभाओ , भाई भतीजे का जमाना है कुछ हमारी भी अर्ज सुनो। यमदूत थे तो क्या हुआ, थे तो इसी दुनिया के। मर गये तो क्या हुआ थोडा असर तो बाकी था। सोंच मे पड गये। आपस मे खुसुर फुसुर करने लगे। सोचा, उपर शायद काम मे आयेगा। बोले चलना तो पडेगा। रुकना हमारे बस मे नही। मगर तुम भी क्या याद करोगे, चलो ठीक है , कुछ देर रुकते है अगला नजारा देखते है। नजर फेरोगे तो चल देंगे।
एक मुर्दा अपनी ही अंतिम यात्रा देख राहा था।
सोचा क्या पता
शायद कुछ बात बने तो .........
अब अंदर की बात सुन सकता था।
ना जाने कौन कौन आया था।
उपरसे बडे दुःखी लग रहे थे।
अंदर से कुछ और ही कह रहे थे.......
जो कभी देखते भी न थे
मोहब्बत की निगाहों से....
उनके दिल से भी प्यार
मुझ पर लुटाया जा रहा था...
हर कोई आता
छाती पीट के रोता.......
कहता बहुत अच्छा था
मन ही मन कहता बहुत लुच्चा था......
मै देखता गया।
पहले नहलाया
फिर सजाया .........
कुछ लोगोने उठाया
बाहर लाके लीटाया.......
कुछ ऊंघं रहे थे
कुछ लांघ रहे थे
कुछ बांध रहे थे
इसी बहाने अपनी भडास निकाल रहे थे.......
बच्चो की तरह मुझे
कंधे पर उठाया ....
काँप उठी
मेरी रूह वो मंज़र देख कर....
.जहाँ मुझे हमेशा के
लिए सुलाया जा रहा था....
मोहब्बत की
इन्तहा थी जिन दिलों में मेरे लिए....
उन्हीं के हाथों,
आज मैं जलाया जा रहा था!!!
बंदे को मायुस होता देखकर , और कितना वक़्त चाहिये यमदूतोनें पुछा? देख ली अपनी अच्छा़ई, पता चली सब सच्चाई । यहाँ कोई नही किसका। दो घडी का खेला है। चला चली का मेला है।भीड से भरा है फिर भी बंदा अकेला है। यमदूत बोले क्या सोच रहे हो। बिना कहे सुने बंदा चुपचाप साथ हो लिया।
अंतिम यात्रा देखके मुर्दे ने शायद सोचा होगा।
"अब पता चला मै कितना नशेमे था चुर ,अपने आप पर था गुरूर। मस्रुफ था अपनी धुनमे खोया था जुनून मे। कई बार शरीक हुआ था जनाजे में। मगर खोया था गहरी निंद मे। जब मेरी बारी आयी तब आया होश। मालूम नही था कंब्खत ऐसा वखत भी आयेगा। जो मुझे भी जलाया जायेगा। "
मगर चिडीया चुग गयी खेत अब पछताये क्या होत। कबीर जैसा कोई बिरला होता है जो जिते जी सोच सकता है ।
"चलती चाकी देखकर , कबीरा दिया रोय ।
दुइ पाटन के बीच में , साबुत बचा ना कोय"!
अब क्या कहें.......
" जाय उमरिया बीत रै, चेत सके तो चेत!! बालू ढेरी जोगिया, मत कर जग सूं हेत! "
मिपा हे मराठी जनांच्या मराठीतून अभिव्यक्तीचे संस्थळ आहे. ते तसेच राहू द्यावे.+ ९९९९९९९९९९ . . .हिंदी तर अजिबात लादू नका. हिंदी भाषा हीच मराठीची प्रथम क्रमांकाची शत्रू आहे. हिंदी लादण्याला हातभार लावू नका.+ ९९९९९९९९९ . . . हिंदी अजिबात नको.