मराठी नहीं है राज ठाकरे..!
💬 प्रतिसाद
(15)
न
नाम्या झंगाट
Fri, 10/09/2009 - 14:35
नवीन
तुम्हाला हा लेखापासुन काय प्रतिसाद अपेक्षित आहे ते कळाले नाही.
तुमचे याबद्द्लचे मत (मराठी नहीं है राज ठाकरे..!) पण कळूद्या..
(आमची माती,आमची माणसं ) नाम्या झंगाट
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म
मड्डम
Fri, 10/09/2009 - 14:42
नवीन
नाम्यांच्या इच्छेवरून माझी प्रतिक्रिया देत आहे...
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३
३_१४ विक्षिप्त अदिती
Fri, 10/09/2009 - 14:47
नवीन
बोल्डपणा कमी झाल्यामुळे प्रबआ.
अदिती
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स
सखाराम_गटणे™
Fri, 10/09/2009 - 14:44
नवीन
टॅग बंद केला
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म
मड्डम
Fri, 10/09/2009 - 14:39
नवीन
लोकतंत्रने हर भारतीय को कही भी रहने का और अपना पेट पालनेके लिये पैसे कमाने का पुरा हक दिया है. ये बात सबको मंजूर होनी चाहीये इसमे कोई शक नही. आज मुंबईमे देश के हर कोनेसे हर राज्य के लोग रहते है और काम करते है. उनके यहां रहने मे किसी को कोई परेशानी नही है. लेकीन जब आप पेट पालने के बहाने आकर यहॉं सत्ताधीश होने का गुंडज्ञगर्दी करने का काम शुरू कर देंगे तो कोई ये क्यो सहे. संजय निरुपम से लेकर अबू आजमी तक मुंबई मे हर दुसरा उत्तर भारतीय नेता रोज खडा होकर उत्तर भारतीयोंको तलवार बॉंटने की बात करता है. मुंबई मे टॅक्सी, रिक्षा चलानेवाले, दूध और सब्जी बेचनेवाले 'भैय्या' वहां के मराठी लोगोंकोही जब धमकाने लगे तो कोई कैसे सहेगा.
मुंबई मे आज गुजराती, बंगाली, पारसी, साऊथ इंडियन और पंजाबी भी रहते है. उनके मुंबई मे रहने के बारे मे कभी किसीने कुछ न ही कहा. क्योंकी उन्होने सिर्फ अपने काम से काम रखा. और मुंबई को और यहा के मराठी लोगोंको अपना माना. तो मराठीयोंने भी उन्हे पुरा प्यार दिया. वो आज जुबॉन से शायद ना हो लेकीन दिल से मराठी है. और उन्हे अपने आपको मराठी कहलाने मे गर्व होता है. ये बात सिर्फ मुंबई के लिये नही तो महाराष्ट्र छोड के दुसरे राज्योंमे रहने वाले मराठीयों को भी लागू होती है.
जो जहॉं रहता है. वहॉं की संस्कृती और वहॉं के लोगों के साथ वो घुलमिल कर रहेगा तो उसे हर कोई अपना मानेगा.
लेकीन जबसे ये बिहारी और उत्तर प्रदेश के गुंडे यहा आये है. मराठी लोगोंका जिना मुश्कील हो गया है. मुंबई मे गॅंग वॉर की, चोरी की, और लुट की घटनाओं के आकडे अगर आप देखेंगे तो यहॉं सबसे जादा लोग उत्तर प्रदेश और बिहार के मिलेंगे. वहा से तडीपार किये गये खून करके भागे हुये और भी बहुत सारे गुनहगार मुंबई मे आकर छुपते है. ये मुंबई को 'बिहार' बनायेंगे ये मराठी कैसे सह पायेगा.
महाराष्ट्र मे आज रोजगार के अवसर ज्यादा है. मुंबई बडा और डेव्हलप्ड शहर है इसमे मराठी लोगोंकी क्या गलती. बिहार और उत्तर प्रदेश के नेताओंने 60 साल क्या किया. वहॉं रोजगार के अवसर क्यों नही मिल रहे. वहॉं तरक्की क्यों नही हो रही. ये उनसे कोई नही पुछता. वहॉं के राजनेताओंने सिर्फ गरीबोंका खून चुसने का काम किया है. उनके राज्योंको भूख, गोली और गरीबी के सिवा कुछ नही दिया. इसमे मुंबई के मराठीयोंकी क्या गलती. देश के सबसे ज्यादा पंतप्रधान उत्तर भारत से है फिर भी वहॉं तरक्की क्यो नही हुई. सालोंसे इस देश मे परिवारवाद चला रहे गांधी-नेहरू घराने के लोग उन्ही राज्योंसे चुन कर आते है न. तो उन्होंने अब तक वहॉं कुछ भी क्यों नही किया. इसके लिये क्या मराठी जिम्मेदार है.
वहॉं के नेताओं को अपनी मूर्तीयॉं लगवाने और पार्कोके निर्माण मे करोडों की राशी खर्च करनेमे ही धन्यता लगती है. उन्हे क्यों नही पुछा जाता, की जिस दलित उध्दार के नाम पर गरीबोंको झांसा देकर उन्होने सत्ता हासिल की वो कहॉं है. सोनिया गांधी के रायबरेलीमे रेल कोच फॅक्टरी के लिये मायावतीने घिनौनी राजनिती के तहत विरोध क्यों किया इस बारे मे उसे क्यों नही पुछा जाता. दुनियाभर मे जहॉं तरक्की चल रही है वहॉं आज भी बंधुआ मजदूरी और भूखमरी क्यो चल रही है. इस बारे मे क्यों नही पुछा जाता.
जबसे लालू के हात से रेल मंत्रालय गया है. आये दिन ट्रेन की बोगियोंमे आग जनी की घटनाये हो रही है. वो क्यो हो रही है और कौन करवा रहा है क्या हम और आप नही जानते. इसके बारे मे उन्हे कौन पुछेगा. एक जमाने मे जहॉं तक्षशीला और नालंदा जैसे विश्वविद्यालयोंने दुनिया को ग्यान का पाठ पढाया वहा पढाई बिचमेही छोडकर 8-10 साल के बच्चोंको काम पर क्यों लगा दिया जाता है. इसके लिये जिम्मेदार कौन ये क्यों नही पुछा जाता. क्या इन सब चिजों के लिये मराठी जिम्मेदार है.
वहॉं के लोंगोंको पेट पालने के लिये दर-दर की ठोकरे खानी पडती है. इस बारे मे हमे खेद है. निश्चितही ये हमारे देश के लिये शर्म की बात है. उनका मुंबईमे आना और यहॉं आकर पेट पालने के लिये काम करने मे हमे कोई ऐतराज नही. लेकीन यहॉं आकर अन्य राज्योंके लोगोंकी तरह सादगी और शालीनतासे रहे तो हमे कोई आपत्ती नही. आये दिन लडकीयों को छेडना. गुंडागर्दी करना, रिक्षा और टॅक्सी चालकोंकी गुंडागर्दी हम कब तक सहेंगे. इन सब चीजोंमे इमेज तो मराठीयोंकीही खराब होनी है.
रही बात राज ठाकरे की तो उन्होंने जो भी किया सालोंसे मराठीयों के मनमे दबी बात बाहर निकालने काम किया है. मै नही समझता कोई गलत बात है. आप को मराठी समझती है या नही मै नही जानता अगर समझती हो तो राज ठाकरे के विचारोंको एकबार समझने की कोशिश किजीये. यों छत्रपती शिवाजी महाराज और बाल गंगाधर तिलक का नाम लेकर मानवता की दुहाई देने के अलावा अगर आप तथ्थोंका समझेंगे तो ज्यादा अच्छा होगा. और उत्तर प्रदेश और बिहारींयोंको केवल महाराष्ट्र मे ही नही. कर्नाटक, गुजरात और आसाम मे भी विरोध होता है. वहॉं क्यो आप कुछ बोलते नही.
राज ठाकरेने समस्त उत्तर भारतीयोंके खिलाफ नही अपितु गुंडागर्दी करनेवाले उत्तर प्रदेश और बिहारीयोंके खिलाफ आंदोलन चलाया है. हिंदी माध्यमों की अधुरी सोच ने उसे उत्तर भारत और हिंदी के खिलाफ आंदोलन का नाम दिया.
रही बात खबरोंकी तो आंदोलन को हिंदी और उत्तर भारत के खिलाफ होने का नाम देने के बाद निरपेक्ष खबरोंकी अपेक्षा करनाही बेकार है.
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मराठी भाषकाची हिंदी
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प
प्रा.डॉ.दिलीप बिरुटे
Fri, 10/09/2009 - 14:53
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स.न.वि.वि.
आपला प्रतिसाद पटण्यासारखा आहे. फक्त प्रतिसाद मराठी भाषेत लिहिला तर बरं होईल असे वाटते.
-दिलीप बिरुटे
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प
प्रसन्न केसकर
Fri, 10/09/2009 - 14:51
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तो वोच उधर सचिन शर्मा के ब्लॉग पे डालनेका. बात खतम. हय क्या हौर नय क्या!
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३
३_१४ विक्षिप्त अदिती
Fri, 10/09/2009 - 14:52
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क्या बोल्या तू भी, येकदम भारीच हं!!
पर तसं बोले तो हम सगळेच लोक आफ्रीकन है।
अदिती
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न
नाम्या झंगाट
Fri, 10/09/2009 - 15:02
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मला मड्ड्मच्या प्रतिसाद पाहून (वाचून नाही) फ्क्त कॉपि - पेस्ट ची दाट शंका का यावी?????
(आमची माणसं, आमचा महाराष्ट्र) नाम्या झंगाट
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म
मड्डम
Sat, 10/10/2009 - 09:04
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बरोबर हाय तुमचं म्हणणं. मराठी माणूस हिंदी लिहू शकतो हे आपण कधी पचवू शकतच नाही ना. असो वर दिलेली प्रतिक्रिया यापूर्वी मीच सचिन शर्माच्या ब्लॉगवर टाकली आहे. केवळ विषय मि.पा.वर यावा या अपेक्षेमुळे पुन्हा टाकली.
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द
दशानन
Sat, 10/10/2009 - 12:27
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असेच म्हणतो...
>>मराठी माणूस हिंदी लिहू शकतो हे आपण कधी पचवू शकतच नाही ना.
मलाच नाही पचत ;)
***
"हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले । "
राज दरबार.....
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३
३_१४ विक्षिप्त अदिती
Sun, 10/11/2009 - 18:00
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नुस्तं वाटून काय फायदा हो झंगाट ... पुरावा द्या आणि मग बोला ना ...
(zzz zzz) अदिती
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अ
अमोल केळकर
Sat, 10/10/2009 - 13:21
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वरील हिंदी लेख कळला नाही.
मराठीत भाषांतर करुन पुनःइथे दिला तर प्रतिक्रिया देता येईल
(मराठी ) अमोल
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भविष्याच्या अंतरंगात डोकावण्यासाठी इथे टिचकी मारा
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प
पिवळा डांबिस
Sat, 10/10/2009 - 17:50
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मुझे करण जौहर या उसकी एनआरआई टाइप फिल्मों से कोई मतलब नहीं है।
यावरून इतकंच कळलं की मराठी माणसांप्रमाणे भय्येसुद्धा काही कारण नसतांना उगीचच त्यांच्या अनिवासींचा उद्धार करतात!!!!
:)
उगाच त्यांना "परप्रांतिय" म्हणून हिणवतो आपण!!!!
शेवटी घरोघरी मातीच्याच चुली!!!!
:)
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श
शाहरुख
Sat, 10/10/2009 - 19:49
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या भय्यानं अनिवासींचा उद्धार केलेला नसून करण जौहरच्या एनआरआई टाईप चित्रपटांचा उद्धार केलाय..(तसा तर त्या चित्रपटांचाही नाही केलेला..फक्त स्वतःला आवडत नसल्याचं सांगितलंय)
अवांतर होऊ नये म्हणून सांगणं भाग पडलं :-D
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