कायम मुंबै त राहिल्यामुळे आणि माहेर् -सासर पण इथेच असल्याने,गाव ही नसल्याने चुलीशी गट्टी तर दूर ओळख पण नाही. हा लेख वाचून वाटलं कि मी कित्ती मजा "मिस" केली आहे . पण लेख आणि प्रतिक्रिया वाचून समाधान मानलं …
पहिला कपातील ती थोडा चहा नैवेद्य म्हणून चुलीत टाकायची.
या लेखातील हे वाक्य वाचून पुढील कविता शोधली. इथे देते आहे.
अंतिम कौर तक / स्वप्निल श्रीवास्तव
» रचनाकार: स्वप्निल श्रीवास्तव » संग्रह: ताख पर दियासलाई
गुंधे हुए आटे के भीतर
छिपी हुई हैं अनगिनत रोटियाँ
और वे औरतें जानती हैं
जो जाँते में पीसती हैं पिसान
जिनके भीतर धधक रहा होता
है तन्दूर
जो बहुत दूर से कुँए से
खींचती हैं जल
जंगल से बीनती हैं लकड़ियाँ
जो चूल्हे की पूजा करती हैं
और भोजन बनाने के बाद
पहला कौर अग्नि को
समर्पित करती हैं
ये औरते जानती हैं
रोटियों के अन्दर छिपी हुई है
अनन्त भूख
और हर रोज़ उनकी तादाद
कम होती जा रही है
चौके में बढ़ते जा रहे हैं लोग
वे तो भूखे पेट सो जाती हैं
लेकिन अन्तिम कौर तक
गेहूँ और चूल्हे के सम्मान की
रक्षा करती हैं.
प्रतिक्रिया
हीहीही
बाब्बौ ओंडके
सुंदर लेख
सुरेख..
मस्त लेख.....
छान लेख, आवडला.
सुधिर, फुलवा, मुक्त-विहारी,
सुंदर लेख!!!
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