किशन बिहारी नुर....३ ( रोमेंटीक )
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💬 प्रतिसाद
(4)
म
मदनबाण
गुरुवार, 12/30/2010 - 14:46
नवीन
मज़ा तो जब है कि मेरी कमी उसे भी खलें!
कभी मैं बिछडूँ तो ऐ 'नूर' याद आऊँ उसे.
वाह !!! :)
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ग
गणेशा
गुरुवार, 12/30/2010 - 17:25
नवीन
यहाँ पे भी तो उसी के करम का हूँ मोहताज़!
किसी गज़ल में ढले वो तो गुनगुनाऊँ उसे !!
किती सुंदर आहेत या ओळी ... कीती रोमँटीक कीती तरल
खुपच सही .. क्रुपया प्रत्येक शायरच्या वेगवेगळ्या शायरी देताना त्यांच्या मागच्या शायरीची (गझलची) लिंक देत चला हि विनंती
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प
प्राजु
गुरुवार, 12/30/2010 - 20:33
नवीन
सुरेख!!
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य
यशोधरा
Fri, 12/31/2010 - 04:14
नवीन
अजीब तरह की शरतें लगाई हैं उसने,
मैं अपने आप को छोडूँ कहीं तो पाऊँ उसे...
सुरेख!
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