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मिपाकरलक्षणे

स — सस्नेह, Mon, 12/23/2013 - 12:23
| जय जय रघुवीर समर्थ | समर्थांसी मनोभावे प्रार्थुनी, मिपाकरांची काही येक लक्षणे डोळियांस दिसली ती श्रोतींयांस विनयपूर्वक सादर . || श्रीमिसळपाव || | मिपाकरलक्षणनाम समास प्रथम | ओम नमोजी संस्थळचालका | नीलकांता मिपामालका | कृपादृष्टीं सदस्यलोका | अवलोकिजे |१| तुज नमू रेवतीतै | अक्षयकान्ते आणि पैसातै | धागीं ठेवी कृपाहस्ते | लेखकुंच्या |२| वंदुनिया सल्लागारचरण | करूनिया संपादकस्मरण | परिक्षणार्थ मिपकरलक्षण | बोलिजेल |३| येक वोरीजिनल एक डूआयडी | उभयलक्षणे सरळ-कानडी | येकयेका घालुन सांगडी | शब्द मांडिले |४| डूआयडीचे लक्षण | पुढिले समासी वर्णन | सावधपणे वाचकजन | परिसोत पुढे |५| आता प्रस्तुत वोरीजिनल | लक्षणे ती तुंदिल | परी काही येक अचळ | होऊन ऐका | ६| जे मिपाकर जन | जयांस जगीं सर्व ज्ञान | जे केवळ आश्रयस्थान | मऱ्हाटीचे |७| संस्थळी सत्वर संचारी | स्वामी-संपादकीं स्तुती करी | कंपू जमवितो अंतुरी | तो येक मिपाकर |८| सांडून सर्वही ज्येष्ठ | नव-आयडीस मानी श्रेष्ठ | सांगे दुज्या संस्थळीची गोष्ट | तो येक मिपाकर |९| समस्त धागे प्रेमें धरी | सदस्यहृदयी वास करी | वक्रोक्तीविण प्रतिसाद करी | तो येक मिपाकर |१०| संपादकांवरी अहंता | अंतरी धरी आढ्यता | अकलेविण दावी विद्वत्ता | तो येक मिपाकर |११| आपुलेच धागे प्रतिसादवी | दुजांचे बाजार उठवी | पॉपकॉर्नचे ढीग दावी | तो येक मिपाकर |१२| विनाकारण वाद करी | प्रतिसादांचे पुच्छ धरी | बहुतांसी टीका करी | तो येक मिपाकर |१३| कंपू धरुनिया हाती | नवागतांस पाडी भ्रांती | धाग्यांच्या वळतो वाती | तो येक मिपाकर |१४| बहु विचक्षण इये जन | तयांमध्ये दावी शहाणपण | परसंस्थळीचे उच्छिष्ट सेवन | करी तो येक मिपाकर |१५| मान अथवा अपमान | लागे ज्यास समान | संपादनाचे ना अनमान | तो येक मिपाकर |१६| धरून प्रतिसादांची आस | धागे पाडी भसाभस | ‘शतकीं’ धरी मनी आस | तो येक मिपाकर |१७| क्रमश :

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25169 वाचन

💬 प्रतिसाद (73)
स
सुहास.. Mon, 12/23/2013 - 12:25 नवीन
हा हा हा !! लय भारी काव्यपाड़किता ;)
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म
मृत्युन्जय Mon, 12/23/2013 - 12:27 नवीन
शतकीं’ धरी मनी आस | तो येक मिपाकर खतरनाक. पण आता शतकी नसता त्रिशतकी आस असते. किमान आम्हाला तरी ;)
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आ
आतिवास Mon, 12/23/2013 - 12:30 नवीन
वा! जमली आहे लक्षणांची अभिव्यक्ती.. अजून काही राहिली आहेत का, ते कळेलच पुढच्या भागांत :-)
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ज
ज्ञानोबाचे पैजार Mon, 12/23/2013 - 12:31 नवीन
कोडईकनाल बरोबर भुछत्री राहिल की. क्रमशः वाचुन बरे वाटले. होउ दे खर्च येउ दे अजुन.
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य
यशोधरा Mon, 12/23/2013 - 12:35 नवीन
झक्कास लिहिलं आहेस! :)
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ज
ज्ञानोबाचे पैजार Mon, 12/23/2013 - 12:37 नवीन
समस्त धागे प्रेमें धरी | सदस्यहृदयी वास करी | वक्रोक्तीविण प्रतिसाद करी | तो येक मिपाकर |१०| असा मिपाकर आमच्या तरी पहाण्यात नाही. बाकी सर्व लक्षणांशी सहमत.
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स
सूड Mon, 12/23/2013 - 12:57 नवीन
>>समस्त धागे प्रेमें धरी | सदस्यहृदयी वास करी | वक्रोक्तीविण प्रतिसाद करी | तो येक मिपाकर |१०| नक्की? आमच्या पाहण्यात एक सदस्य कम संपादक आहेत असे अजातशत्रू.
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↩ प्रतिसाद: ज्ञानोबाचे पैजार
ज
ज्ञानोबाचे पैजार Tue, 12/24/2013 - 04:50 नवीन
Exception that proves the rule.
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↩ प्रतिसाद: सूड
य
यसवायजी Mon, 12/23/2013 - 12:37 नवीन
दंडवत _/\_
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म
मुक्त विहारि Mon, 12/23/2013 - 12:45 नवीन
हहपु
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अ
अमोल मेंढे Mon, 12/23/2013 - 12:46 नवीन
_/\_
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ज
जेपी Mon, 12/23/2013 - 12:51 नवीन
कंपुचे लक्षण आवडले .
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स
सूड Mon, 12/23/2013 - 13:00 नवीन
आवडलं!! ओवीची गेयता शेवटपर्यंत टिकवून ठेवल्याबद्दल अभिनंदन. *clapping*
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म
मनीषा Mon, 12/23/2013 - 13:03 नवीन
जय जय स्नेहांकिता तै समर्थ !! :)
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प
प्यारे१ Mon, 12/23/2013 - 13:06 नवीन
>>>क्रमश : हे आवडलं. ;)
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भ
भावना कल्लोळ Mon, 12/23/2013 - 13:33 नवीन
नमस्कार तुज माउली l धाडिते एक मिपाकरी l झालीसे इम्प्रेसी l ओवी काव्य ते वाचुनीll
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प
पैसा Mon, 12/23/2013 - 13:34 नवीन
अगागागागा! साष्टांग नमस्कार! ते शेवटचं "क्रमशः" बघून जीव भांड्यात पडला! (कसल्या ते विचारू नये! =)))
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ब
बॅटमॅन Mon, 12/23/2013 - 13:36 नवीन
कसल्या ते विचारू नये!
टाकली काडी?? कुठे ते विचारू नये =)) :yahoo:
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↩ प्रतिसाद: पैसा
प
पैसा Mon, 12/23/2013 - 13:39 नवीन
मिपाकर असल्याचं सिद्ध करायला नको? ;)
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↩ प्रतिसाद: बॅटमॅन
ब
बॅटमॅन Mon, 12/23/2013 - 13:44 नवीन
अगदी अगदी!! पक्ष(काडीसारू), साध्य(काड्या टाकणे), अन सिद्धता!!!! (उद्गारचिन्हे हीही एक काडीच, नै =)) )
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↩ प्रतिसाद: पैसा
प
पैसा Wed, 12/25/2013 - 07:15 नवीन
उद्गारचिन्हे हीही एक काडीच, नै
अगदी, टोकाला असलेल्या त्या "गुल" सकट!
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↩ प्रतिसाद: बॅटमॅन
अ
अनन्न्या Mon, 12/23/2013 - 13:56 नवीन
बय्राच दिवसांनी आलाय धागा स्नेहांकिता!
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अ
अभ्या.. Mon, 12/23/2013 - 14:24 नवीन
ब्येस्ट ब्येस्ट स्नेहातै. लै दिवसानी सवड मिळालीय? का हा धागा म्हणजे इतक्या दिवसाच्या निरिक्षणाचा परिपाक आहे? ;)
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य
युगंधर Mon, 12/23/2013 - 14:35 नवीन
:):)
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म
मितान Mon, 12/23/2013 - 14:58 नवीन
खतरनाक !!!! :) अजून येऊदे..
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म
मूकवाचक Mon, 12/23/2013 - 15:32 नवीन
:)
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च
चित्रगुप्त Mon, 12/23/2013 - 15:39 नवीन
जबरदस्त. डुआयडीलक्षणांच्या प्रतिक्षेत.
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व
विकास Mon, 12/23/2013 - 15:50 नवीन
सॉलीड्ड! डूआयडीचे लक्षण | पुढिले समासी वर्णन | वाचण्यास उत्सुक!
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क
किसन शिंदे Mon, 12/23/2013 - 15:56 नवीन
कोपरापासून नमस्कार गो ताय. अगदी व्यवस्थितपणे एक एक लक्षण शोधून, निवडून लिहीलंय. तुफान आवडल्या गेले आहे. =)) =))
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ड
डॉ सुहास म्हात्रे Mon, 12/23/2013 - 16:12 नवीन
खंग्री काव्य ! झकास !!
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अ
अजया Mon, 12/23/2013 - 17:01 नवीन
मस्त!!
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ख
खेडूत Mon, 12/23/2013 - 17:58 नवीन
आवडलं!! भारीच... :)
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व
विजुभाऊ Mon, 12/23/2013 - 18:28 नवीन
अरे झक्कास... मस्त लिवलय. आणखी एक लक्षण अ‍ॅड करा कोणी एक लाडवलेले बाळ | इतिहास तज्ञ म्हणवे वाचुनी विकी काळ| सांगे आपुलीच कीर्ति. तो येक मिपाकर. उडवी भसाभस प्रतिसाद | स्वल्प ज्ञानावर टीका करणारे | झाके ऐसी स्वमतीची झेप | तो येक मिपाकर (अवांतर: हा प्रतिसाद हमखास उडणार...... ;) )
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आ
आनन्दिता Sun, 01/19/2014 - 21:01 नवीन
खिक्क!!! =))))))
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↩ प्रतिसाद: विजुभाऊ
अ
अमेय६३७७ Mon, 12/23/2013 - 18:41 नवीन
जमलंय
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ब
बॅटमॅन Mon, 12/23/2013 - 18:45 नवीन
आध्यात्मिक जितके वरकरणी | लघळ भोचक अंतःकरणी | लिडबिडत दांभिकपणी | तो येक मिपाकर || दिसतां वेगळे काहीही | जे न पटे स्वतःला काही | उडवी सरसावुनि बाही | तो येक मिपाकर || दांभिक आणि सोयीस्कर | तर्‍ही वरडे समतापर | घेई गोंजारुनी वर | तो येक मिपाकर || (हाही उडणार की क्कॉय ;) )
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य
यसवायजी Mon, 12/23/2013 - 19:19 नवीन
ओ साहेब बास की आता..
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↩ प्रतिसाद: बॅटमॅन
प
पाषाणभेद Mon, 12/23/2013 - 21:21 नवीन
+१ छान काव्य.
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↩ प्रतिसाद: बॅटमॅन
स
सूड Tue, 12/24/2013 - 10:11 नवीन
बळेबळे काडी सारी। येता अंगाशी मागे सरी॥ म्हणें केली हो मस्करी। तो येक मिपाकर॥ प्रतिसाद देई जणू शर्करा। चेहरा न दिसू दे खरा॥ राही सकळसदस्यासि बरा। तो येक मिपाकर॥ मोजक्या प्रश्ने उत्तरे काढी। अपुल्या सोयीची लावे खोडी॥ मजा पाहात बसे रोकडी। तो येक मिपाकर॥
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↩ प्रतिसाद: बॅटमॅन
ब
बॅटमॅन Tue, 12/24/2013 - 10:50 नवीन
चार शब्दांना चारपैकी चार मार्क दिल्या गेले आहेत. समस्त दांभिकशिरोमणी | खव-प्रतिसादी धरिता गुळणी | वयासवे बुधीचिया ठिकाणी | कधी चुकोनी न येई ||
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↩ प्रतिसाद: सूड
स
सस्नेह Wed, 12/25/2013 - 18:40 नवीन
मारा तो क्या मारा, शालजोडी...
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↩ प्रतिसाद: सूड
अ
अत्रुप्त आत्मा Mon, 12/23/2013 - 19:47 नवीन
@विनाकारण वाद करी | प्रतिसादांचे पुच्छ धरी | बहुतांसी टीका करी | तो येक मिपाकर |१३| >>> Image removed. काय तेरावं घातलय!!! Image removed.
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प
प्रचेतस Tue, 12/24/2013 - 04:09 नवीन
=)) जबरी. पुढील समासांच्या प्रतिक्षेत.
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न
नाखु Tue, 12/24/2013 - 04:44 नवीन
ये तो ट्रेलर है पिक्चर अभी बाकी है. याच प्रतिक्षेत..
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प
पैसा Tue, 12/24/2013 - 05:39 नवीन
निखळ गंमतीच्या धाग्यांवरी| बळंच स्कोर सेटलिंग करी| धाग्यांना धाडी काश्मिरी| तो येक मिपाकरु|| पहिल्या २/३ नंबरावरी| घुसून उपप्रतिसाद उगीच मारी| धागे हायजॅक करी| तो येक मिपाकरू|| आपुलेच धागे काढी वरी| इतरांस मारी फाट्यावरी| संपादकांवरी दात धरी| तो येक मिपाकरु||
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ग
गणपा Tue, 12/24/2013 - 08:40 नवीन
आपली काव्य प्रतिभाही आवडली. ;)
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↩ प्रतिसाद: पैसा
व
विकास Tue, 12/24/2013 - 21:39 नवीन
सहमत. जपून रहायला हवे! ;)
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↩ प्रतिसाद: गणपा
प
पैसा Wed, 12/25/2013 - 07:14 नवीन
अजून बरीच निरीक्षणे आहेत, पण सध्या सौजन्य संवत्सर पाळत असल्यामुळे हॅ हॅ हॅ...
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↩ प्रतिसाद: विकास
स
सस्नेह Wed, 12/25/2013 - 18:42 नवीन
सामील व्हा !
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↩ प्रतिसाद: गणपा
र
रमेश आठवले Tue, 12/24/2013 - 06:01 नवीन
|| सार्थ करी रामदास उक्ती 'टवाळा आवडे विनोद' सदा हाणी प्रतिसाद तो ही येक मिपाकर ||
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