कविता
| तारीख | लेखक | प्रतिसाद | |
|---|---|---|---|
| दाखविली मातेची व्यथा कौतुके | श्रीकृष्ण सामंत | 2 | |
| तुला समजलो, आणि समजली तुझी स्वच्छता | केशवसुमार | 6 | |
| (दिवस असे हे ढकलायचे __) | अमोल केळकर | 5 | |
| सुखाचा शोध | काळा_पहाड | 3 | |
| दुसरी बाजू ऐकली पाहिजे | श्रीकृष्ण सामंत | 0 | |
| आठवणी | अथांग सागर | 8 | |
| लावणी - प्रणयरातीला कुठे चालला | पुष्कराज | 11 | |
| म्हणून म्हणतो नका घालूं वाद | श्रीकृष्ण सामंत | 6 | |
| करिन मी तुजवर प्रीति | श्रीकृष्ण सामंत | 0 | |
| गुलाबी थंडी | चाणक्य | 7 | |
| पारिजातक | namdev narkar | 2 | |
| उदारीकरण | काळा_पहाड | 9 | |
| शून्याची महती | श्रीकृष्ण सामंत | 7 | |
| दातांची व्यथा | श्रीकृष्ण सामंत | 3 | |
| शब्दहो, याना जरा...! | केशवसुमार | 10 | |
| 'टाळी'बाज | केशवसुमार | 6 | |
| कालची गळाली फुले रे | कौस्तुभ | 10 | |
| ईश्वराचे कोडे | श्रीकृष्ण सामंत | 0 | |
| फादरस डे | श्रीकृष्ण सामंत | 6 | |
| कालाय तस्मै नम: | श्रीकृष्ण सामंत | 13 |