कविता
| तारीख | लेखक | प्रतिसाद | |
|---|---|---|---|
| उद्वेग विसरून कसं चालेल? | श्रीकृष्ण सामंत | 0 | |
| (...मी खरा की तू खरा?) | चतुरंग | 4 | |
| सांभाळा हो! मला कुणीतरी | श्रीकृष्ण सामंत | 2 | |
| श्रावण. | रामदास | 16 | |
| ही केशरी संध्याकाळ | श्रीकृष्ण सामंत | 4 | |
| मामाच्या गावाला | अरुण मनोहर | 16 | |
| पारिजात | मृत्युन्जय | 3 | |
| ( जाता दुरदेशी सुख वाटे जीवा -) | अमोल केळकर | 8 | |
| खुषी न मिळता मिळते रुसणे | श्रीकृष्ण सामंत | 2 | |
| (आता कशाला उड्याची बात!) | चतुरंग | 12 | |
| पोचलो का आपण? | धनंजय | 22 | |
| पडक्या घरास माझ्या | suralesandip | 2 | |
| भुंगा | आनंदयात्री | 27 | |
| दोष होता केला मी तो चुकून | श्रीकृष्ण सामंत | 4 | |
| मोनालीसा | कौस्तुभ | 6 | |
| चिंब पावसात तू न्हात असशील... | फटू | 6 | |
| परतुनी येईन मी.... | अजिंक्य | 1 | |
| लळा जिव्हाळा शब्दच मोठे | श्रीकृष्ण सामंत | 0 | |
| खणले रे पथ | हेरंब | 6 | |
| रासलीला | पुष्कराज | 10 |