कविता
| तारीख | लेखक | प्रतिसाद | |
|---|---|---|---|
| आईच मन | तृप्ति २३ | 0 | |
| किंचित अस्वस्थ वाटते आहे ! | संदीप-लेले | 1 | |
| (तनुने नानास मी टू म्हणणे ) | ज्ञानोबाचे पैजार | 18 | |
| जनुक जिन्याची सर्पिल वळणे | अनन्त्_यात्री | 14 | |
| ठसा तुज आठवांचा...! | मनस्वी मानस | 0 | |
| वेदना जहरी | चांदणशेला | 0 | |
| कुंकवाच्या धन्यानं अशी रात जागवली | अविनाशकुलकर्णी | 8 | |
| वृक्षवल्ली आम्हा सोयरी | नायकुडे महेश | 0 | |
| तू काळजाला भिडावे | परशुराम सोंडगे | 0 | |
| तू काळजाला भिडावे | परशुराम सोंडगे | 0 | |
| मोबाईलची शेजआरती | पाषाणभेद | 0 | |
| अनन्तयात्री | अनन्त्_यात्री | 6 | |
| भुकेच्या ज्वाळा | चांदणशेला | 0 | |
| लोकशाहीला नाही वर्ज्य | चांदणे संदीप | 0 | |
| बापाचे मुलीस पत्र.. | प्रियाभि.. | 7 | |
| कॉलेज | अमरेंद्र बाहुबली | 2 | |
| झरे | हणमंतअण्णा शंकराप्पा रावळगुंडवाडीकर | 0 | |
| तव नयनांचे दल | हणमंतअण्णा शंकराप्पा रावळगुंडवाडीकर | 1 | |
| उत्तररात्र | हणमंतअण्णा शंकराप्पा रावळगुंडवाडीकर | 2 | |
| कधी असतेस, कधी नसतेस.... | नायकुडे महेश | 1 |