कविता
| तारीख | लेखक | प्रतिसाद | |
|---|---|---|---|
| अपूर्ण कविता ..... | मयुरMK | 1 | |
| एका कातरवेळी ………. | एकप्रवासी | 0 | |
| एका कातरवेळी ………. | एकप्रवासी | 0 | |
| एका कातरवेळी ………. | एकप्रवासी | 0 | |
| काटा हालेना, काटा चालेना | बाजीप्रभू | 14 | |
| गुजरान | हरिदास | 4 | |
| मिपात जरा ऊदासच वाटलं... | अभिदेश | 10 | |
| धर्मासाठी........... | एकप्रवासी | 9 | |
| माझी पोर | अज्ञात | 0 | |
| अस्तित्वाची बोंब | संदीप डांगे | 11 | |
| जर्जरी वार्धक्य माझे | तिमा | 21 | |
| घरात जरा उदासच वाटलं | अन्नू | 6 | |
| पुण्यात जरा ऊदासच वाटलं | जव्हेरगंज | 33 | |
| अहो मानवी बाईजी, अहो मानवी रावजी | माहितगार | 5 | |
| चारोळी: गैरसमजांशी वैर! | निमिष सोनार | 1 | |
| तहान | अज्ञात | 12 | |
| स्त्री - काल आणि आज | विवेकपटाईत | 13 | |
| विरजनातली साय | पालीचा खंडोबा १ | 2 | |
| चाफा | शिव कन्या | 18 | |
| काम दाखव फेकू... | तर्राट जोकर | 15 |