कविता
| तारीख | लेखक | प्रतिसाद | |
|---|---|---|---|
| यशाचे आता गा मंगल गान | पाषाणभेद | 1 | |
| उरलो आता भिंतीवरल्या ... | चित्रगुप्त | 11 | |
| पाहीले असे खूप वार | बाजीगर | 6 | |
| वेदनाच मला मिळू दे | पाषाणभेद | 6 | |
| बोटावर शाईचा अजून रंग ओला | ज्ञानोबाचे पैजार | 18 | |
| सिक्रेट धंद्याचे | पाषाणभेद | 0 | |
| समुहगीतः भारतभूचे सुपुत्र आम्ही | पाषाणभेद | 2 | |
| मी पुन्हा येईन | पाषाणभेद | 10 | |
| मी पुन्हा येईल | शुभांगी दिक्षीत | 0 | |
| मौनाइतके कुणीच नाही | प्राची अश्विनी | 11 | |
| कविता : भेट मित्रांची… | bhagwatblog | 2 | |
| हस्तर कविता :- महायुती | हस्तर | 0 | |
| ' भाज्यांचं संमेलन ' | mukund sarnaik | 1 | |
| आमचं ठरलयं, संयुक्त महाराष्ट्रात बेळगाव उरलंय | पाषाणभेद | 1 | |
| जात | शुभांगी दिक्षीत | 0 | |
| जात | शुभांगी दिक्षीत | 0 | |
| जात | शुभांगी दिक्षीत | 0 | |
| जात | शुभांगी दिक्षीत | 0 | |
| जात | शुभांगी दिक्षीत | 0 | |
| जात | शुभांगी दिक्षीत | 0 |