कविता
| तारीख | लेखक | प्रतिसाद | |
|---|---|---|---|
| मी पुरुष बिच्चारा | गणेशा | 2 | |
| स्वप्नांचे पान मुंबई . . . | गणेशा | 5 | |
| पावसांत वडवानल ! ! ! | निरन्जन वहालेकर | 9 | |
| वाक्याचा अर्थ सांगाल का? | शानबा५१२ | 14 | |
| नाव माझे याच नावाच्या पुढे लागेल का? | स्वानंद मारुलकर | 8 | |
| भारत माझा देश आहे........... | संदीप परांजपे | 13 | |
| प्रेमाचा आयकर | स्पा | 12 | |
| अवचीत यावं कुनी | पाषाणभेद | 0 | |
| नि:शब्द ……! ! ! | निरन्जन वहालेकर | 5 | |
| गण: माझ्या गणाला गणपती आले | पाषाणभेद | 4 | |
| भेटेन पुन्हा एकदा... नव्याने पुन्हा... | जाई अस्सल कोल्हापुरी | 4 | |
| चाललो मी.... | स्वानंद मारुलकर | 7 | |
| सही | नगरीनिरंजन | 7 | |
| गंमतीची गोष्ट | नीधप | 8 | |
| <घोगरा> | नाटक्या | 8 | |
| मोगरा | शुचि | 15 | |
| माणूस म्हणून जगण्याची ही किंमत.... | दशानन | 10 | |
| “( अ ) द्वितिय ” प्रेम | निरन्जन वहालेकर | 6 | |
| देवा तु चुकलास | प्रीत-मोहर | 16 | |
| हे खेळ संचिताचे .....! | गंगाधर मुटे | 10 |