कविता
| तारीख | लेखक | प्रतिसाद | |
|---|---|---|---|
| माझे मन सुखाच्या मागे धावत असता.. | संजयशिवाजीरावगडगे | 3 | |
| मावळतीला रंग शोधणारा ढग मी... | फ्रॅक्चर बंड्या | 6 | |
| जीव तुझा कासावीस ... | वैभव देशमुख | 9 | |
| एकटीच होते बरी मी एकटीच होते खरी | झुम्बर | 5 | |
| चिंधी | स्पंदना | 5 | |
| (बघ त्याची आठवण येते का?) | अडगळ | 19 | |
| चला दोस्तहो सैपाकावर खर्डू काही ! | केशवसुमार | 23 | |
| दुरावा | ऋषिकेश | 17 | |
| निस्सिम प्रेम | चिंगुसविकॄतजोशी | 1 | |
| अहंकार | दिलीपकुमार | 1 | |
| “ घेतला वसा षंढतेचा ” | निरन्जन वहालेकर | 4 | |
| धागा धागा अखंड दळूया | केसुरंगा | 11 | |
| कंट्रोल झेड | अविनाश ओगले | 24 | |
| तंगड्यांवर तंगडे | रणजित चितळे | 1 | |
| पराक्रमी असा मी : हझल | गंगाधर मुटे | 4 | |
| माझ्या 'गोव्या'च्या पुडीत | अडगळ | 22 | |
| जीवन म्हणजे मुशायरा | अजय जोशी | 1 | |
| <घागरा> | अवलिया | 10 | |
| दयाळू | सौरभ परांजपे | 3 | |
| प्रश्न | सौरभ परांजपे | 1 |