कविता
| तारीख | लेखक | प्रतिसाद | |
|---|---|---|---|
| अस्सल देशीच ( विदेशी कायकू) | विजुभाऊ | 7 | |
| बेघर | बेसनलाडू | 22 | |
| घर | sur_nair | 12 | |
| पाठलाग | निरन्जन वहालेकर | 0 | |
| कोल्हापुर | नाद्खुळा | 2 | |
| स्वप्ने | फ्रॅक्चर बंड्या | 0 | |
| (....पुन्हा पुन्हा!) | चतुरंग | 19 | |
| रस्त्यात मामा आडवा येतो जेंव्हा... | Navigator | 2 | |
| जातो म्हणतोस..... | Dhananjay Borgaonkar | 7 | |
| ..... पुन्हा पुन्हा ! | जयवी | 7 | |
| पहिला पाउस | नाद्खुळा | 5 | |
| नजर | प्रभो | 5 | |
| परम सन्तोश | निरन्जन वहालेकर | 5 | |
| भग्न किनारे | जयवी | 10 | |
| आठव | आमोद | 5 | |
| जाणीव | तुका म्हणे | 1 | |
| स्त्री - पुरुष | मंगेशपावसकर | 15 | |
| जबरा नशीला ! ! ! | निरन्जन वहालेकर | 1 | |
| करप्शन | श्रीराम पेंडसे | 2 | |
| चला जोडीनं तण हे काढू, चला ठिबकसिंचन करू | पाषाणभेद | 0 |