कविता
| तारीख | लेखक | प्रतिसाद | |
|---|---|---|---|
| चांदण्याचे ओठ तुझे | अरुंधती | 10 | |
| प्रवास (न) अन्ताचा ! ! ! | निरन्जन वहालेकर | 0 | |
| सावल्या | विशाल कुलकर्णी | 3 | |
| सवय झाली आहे | पाषाणभेद | 4 | |
| ॥ प्राजक्त ॥ | स्पंदना | 25 | |
| लावणी: मोबाईल चार्ज करा तुमचा | पाषाणभेद | 2 | |
| शेत देईल पिवळं सोनं | पाषाणभेद | 1 | |
| गझलचे छन्द्शास्त्र... | प्रदीपा | 0 | |
| टाकून द्या ह्या वंगाळ सवयी | पाषाणभेद | 0 | |
| लावणी : मुंबईची सहल | पाषाणभेद | 5 | |
| (या कंपूची दोन माणसे फिरतिल तुमच्या भवती) | राजेश घासकडवी | 26 | |
| "नेत्यास इशारा" | अरुंधती | 4 | |
| त्सुनामी मनांतले ! ! ! | निरन्जन वहालेकर | 4 | |
| नाच नाचूनी नाचू मी किती | पाषाणभेद | 1 | |
| बैठकीची लावणी: करीते मी विडा | पाषाणभेद | 1 | |
| वेड | स्पंदना | 8 | |
| ..नको रातराणी नको पारीजात.. | कानडाऊ योगेशु | 24 | |
| दु:ख | चन्द्रशेखर गोखले | 0 | |
| हलकेच हातांनी घास भरव तू गे मजला माता | पाषाणभेद | 4 | |
| (केवढे चावणे हे गजल दरगजल) | चतुरंग | 11 |