कविता
| तारीख | लेखक | प्रतिसाद | |
|---|---|---|---|
| असा पाऊस | पाषाणभेद | 9 | |
| कुरळ्या बटावर माझ्या | अविनाशकुलकर्णी | 4 | |
| (व्हिस्की पिऊन आलो...) | गड्डा झब्बू | 12 | |
| (काय करून आलो) | नाखु | 40 | |
| (चहा पिऊन आलो..) | ज्ञानोबाचे पैजार | 9 | |
| काॅफी पिऊन आले... | प्राची अश्विनी | 40 | |
| वजनदार! | चलत मुसाफिर | 8 | |
| (मिपा हे, दर्जेदार, लेखनाचे, म्हणे व्यासपीठ आहे) | ज्ञानोबाचे पैजार | 13 | |
| डोह-१ | सागरलहरी | 2 | |
| डोह | सागरलहरी | 2 | |
| कुरबुर झाली | पाषाणभेद | 4 | |
| धागा चालेना, धागा पळेना... धागा संथ चाली, काही केल्या पेटेना | चामुंडराय | 15 | |
| मळभ..! | जेनी... | 17 | |
| दे दे दे दे दे दे | पाषाणभेद | 9 | |
| आज मी पुन्हा नापास झालो | खिलजि | 6 | |
| गझल : पुन्हा एकदा... | bhagwatblog | 9 | |
| शोधत होतो पुन्हा स्वत:ला | अनन्त्_यात्री | 2 | |
| ती म्हणाली " चिमणी " , मी म्हणालो भुर्रर्रर्र | खिलजि | 5 | |
| वटवटसावित्री | खिलजि | 4 | |
| मी तुझा विचार करते | शिव कन्या | 2 |