कविता
| तारीख | लेखक | प्रतिसाद | |
|---|---|---|---|
| निर्झर | पाषाणभेद | 7 | |
| माफ करा राजे आम्ही पितो , होय आम्ही पितो | खिलजि | 5 | |
| अभंग... | bhagwatblog | 5 | |
| घनदाट गर्द रेशमी केशकुंतल | अविनाशकुलकर्णी | 2 | |
| काल धरण बांधिले | अनन्त्_यात्री | 5 | |
| कधीकधी मी हळवा होतो , बघुनी देव दानवांत | खिलजि | 4 | |
| सुखाच्या सीमेवर दुःखांची घरे वसतात | खिलजि | 4 | |
| प्रेम कोडगे घेऊन फिरलो | खिलजि | 3 | |
| पूर्वी आपण जिथे भेटायचो , तिथे आता एक टपरी झालीय | खिलजि | 12 | |
| पावसाविषयी असूया | पाषाणभेद | 5 | |
| तर्काच्या सीमेवर तेव्हा | अनन्त्_यात्री | 4 | |
| सर्पणाला एकदा पालवी फुटली | खिलजि | 24 | |
| पृथ्वी उवाच | श्रेयासन्जय | 9 | |
| पावसा पावसा पड रे | बिपीन सुरेश सांगळे | 2 | |
| पावसा पावसा पडू नकोस | बिपीन सुरेश सांगळे | 4 | |
| कोडगं व्हायचं... | निओ | 4 | |
| ऑफिसात जाऊन आलो | महासंग्राम | 4 | |
| तुझे शहर | शिव कन्या | 11 | |
| कविता पिंपळपान | अत्रुप्त आत्मा | 32 | |
| बिल देऊन आलो.. | गवि | 32 |