कविता
| तारीख | लेखक | प्रतिसाद | |
|---|---|---|---|
| हो मी अर्जुन आहे.. | निओ | 3 | |
| एकदा टारझन अंगात आला | खिलजि | 57 | |
| दिवसातून छप्पन वेळा | अनन्त्_यात्री | 5 | |
| दोन भिकारी भीक मागती, पुलाखाली करिती वस्ती | खिलजि | 16 | |
| शीर्षक नाही | मूखदूर्बळ | 0 | |
| आत्मताडनाची कविता..... | शिव कन्या | 1 | |
| तिच्या कपाळावरचा घामाचा थेम्ब , ओघळून हळुवार हनुवटीपर्यंत आला | खिलजि | 11 | |
| मिणमिणता दिवा. | Jayant Naik | 4 | |
| निनावी कल्लोळ | नाखु | 11 | |
| जोहार परकीयासी फितुरांचा जोहार __/|__ | माहितगार | 2 | |
| हळूहळू साऱ्यांनीच प्रेमाचं दुकान मांडून टाकलं | खिलजि | 4 | |
| सगळीकडे सारखेच | चांदणे संदीप | 17 | |
| परत पेटेल मेणबत्ती | खिलजि | 0 | |
| संताप | कुसुमिता१ | 2 | |
| रानभेदी..!! | विशुमित | 6 | |
| रातराणीचे सुगंधी फूल आहे ती! | सत्यजित... | 13 | |
| उकाड्याची रात्र, भिजलेली दुपार | हणमंतअण्णा शंकराप्पा रावळगुंडवाडीकर | 6 | |
| असेहि एकदा व्हावे | खिलजि | 14 | |
| दंतकथा | अनन्त्_यात्री | 5 | |
| ती जशी जशी जुनी होत गेली | खिलजि | 0 |