कविता
| तारीख | लेखक | प्रतिसाद | |
|---|---|---|---|
| हे चैतन्याच्या विराटा | फुंटी | 5 | |
| चारोळी | Swapnaa | 2 | |
| सैल नसू दे मिठी जराही! | सत्यजित... | 13 | |
| सैल असावी मिठी जराशी... | प्राची अश्विनी | 43 | |
| चल उठ रे बेवड्या झाली सांज झाली... बाहेर दारू गुत्त्यांना हलकेच जाग आली | चामुंडराय | 7 | |
| या देशात नेमक चाललयं काय? | परशुराम सोंडगे | 2 | |
| प्रजासत्ताक ... | फुंटी | 0 | |
| प्रजासत्ताक ... | फुंटी | 0 | |
| प्रजासत्ताक ... | फुंटी | 0 | |
| प्रजासत्ताक ... | फुंटी | 0 | |
| प्रजासत्ताक ... | फुंटी | 0 | |
| तू | चुकार | 6 | |
| (खमकेच टगे बसतात इथे) | दमामि | 20 | |
| नवखेच सखे फसतात इथे | विशाल कुलकर्णी | 23 | |
| मनाचं प्लॉटिंग | फुंटी | 2 | |
| (जरही) या दिशेला एकदाही यायचे नव्हते मला | ज्ञानोबाचे पैजार | 9 | |
| शब्दविता | फुंटी | 4 | |
| (तरही) या दिशेला एकदाही यायचे नव्हते मला! | सत्यजित... | 10 | |
| या दिशेला एकदाही यायचे नव्हते मला.. वेगळे सुचलेले-- | राघव | 9 | |
| (भिती तुझ्याउरी पण) | नाखु | 6 |