कविता
| तारीख | लेखक | प्रतिसाद | |
|---|---|---|---|
| दिल्लीच्या दरबारामधली राजा आणिक राणी. | उपटसुंभ | 8 | |
| (दूर आहे डेडलाईन अजूनि) | संदीप चित्रे | 5 | |
| ओळखा पाहूं! | श्रीकृष्ण सामंत | 1 | |
| (बेचैन) | चतुरंग | 14 | |
| (चैन) | केशवटुकार | 17 | |
| आमची 'चैन' आहे! | मिसळपाव | 3 | |
| चैन | अनिरुद्ध अभ्यंकर | 27 | |
| दूरदेशी... | पद्मश्री चित्रे | 13 | |
| माझी पाखरे | पुष्कराज | 6 | |
| "कवडसा" | मनीषा | 1 | |
| तुझे नि माझे मिटू दे अंतर | पुष्कराज | 6 | |
| तुझ्या गळा, माझ्या गळा..! | उपटसुंभ | 3 | |
| विडंबन - विश्वासदर्शक ठरावाच्या निमित्ताने | उपटसुंभ | 1 | |
| एक शून्य ...... | अरुण मनोहर | 6 | |
| बुश:काल होता होता, `लाल'रात्र झाली... | अविनाश ओगले | 24 | |
| पहाट | पंचम | 9 | |
| माझी सुंदर आई | श्रीकृष्ण सामंत | 2 | |
| ठपका! | चतुरंग | 13 | |
| घरात भरल्या घुसले उंदीर... | अविनाश ओगले | 15 | |
| ठिपका | अनिरुद्ध अभ्यंकर | 22 |