कविता
| तारीख | लेखक | प्रतिसाद | |
|---|---|---|---|
| रात्र जागूनी झोपीजाण्याचे दिन आले | श्रीकृष्ण सामंत | 15 | |
| इथले प्रत्येक क्षण.! | अंकुश चव्हाण | 0 | |
| भुमीपुत्र... | अंकुश चव्हाण | 0 | |
| उघड दार देवा आता... | अंकुश चव्हाण | 2 | |
| श्वास | पेशवे बाजीराव तिसरे | 0 | |
| प्रतिसाद विजूभै का असा लिहिलात! | केसुरंगा | 30 | |
| रुद्ध प्रतिभा चतुरस्र वाहू दे | धनंजय | 18 | |
| माझा विनोद वाचणार का? | विपुल वर्तक | 5 | |
| "किती धटिंगण किती भयंकर"... ई डंबन... | बेचवसुमार | 1 | |
| (सांगा ढेकुण कुणी हा पाहिला ) | अमोल केळकर | 8 | |
| एका तळ्यात होती बदके पिले अनेक... | मृगनयनी | 6 | |
| शिवकल्याण राजा .... | मनीषा | 21 | |
| नव्हतो ग! मी सजणे असा | श्रीकृष्ण सामंत | 0 | |
| अगागागागाऽऽगाऽऽऽगा!!!!! | पिवळा डांबिस | 28 | |
| (जिज्ञासू) | चतुरंग | 12 | |
| भेळपुरीच्या गाड्या | केशवसुमार | 15 | |
| कविकिरडुंची साठमारी ... (विडंबनाची भेळपुरी) | केशवटुकार | 10 | |
| आज कल प्रेम फार स्वस्त झालंय..... | भुषण भोले | 1 | |
| म्हणून म्हणतो ऐका माझे ... | अंकुश चव्हाण | 1 | |
| डोळ्यांसमोर तीच आता दिसणार उठता बसता..! | उपटसुंभ | 3 |