कविता
| तारीख | लेखक | प्रतिसाद | |
|---|---|---|---|
| दिसभर उन्हातान्हात | पाषाणभेद | 0 | |
| तसा प्रत्येक दिवशी मून येतो | केशवसुमार | 3 | |
| कावळे ... | विश्वेश | 2 | |
| जो तो येतो मारून जातो | पाषाणभेद | 0 | |
| मी बत्तासा गोल गोल | पाषाणभेद | 0 | |
| ताळेबंद | सुचेता | 1 | |
| इतकेच मला भरताना... | केशवसुमार | 7 | |
| आशीर्वाद..? | चन्द्रशेखर गोखले | 0 | |
| अरेरे तुझे काय झाले हे जोश्या | आदिजोशी | 4 | |
| कल्लोळ | अज्ञातकुल | 4 | |
| निओ-अद्वैती पसायदान | मूकवाचक | 6 | |
| अर्धसत्य.. | विसोबा खेचर | 8 | |
| प्रयत्न | निशान्त | 4 | |
| मी बोर्ड बोलतोय... | अत्रुप्त आत्मा | 34 | |
| माझ्या शब्दांनी एवढे स्वस्त व्हायला नको होते! | आर्या१२३ | 24 | |
| नियतीचा क्रूर खेळ | स्वर भायदे | 4 | |
| आभाळाच्या मांडवाला भुई ची रे हाक | गणेशा | 17 | |
| संपत्या सुटीचे पूर्वरंग | बहुगुणी | 2 | |
| रंग कवितेचे - | विदेश | 1 | |
| अताशा मला हे असे काय होते | अरुण मनोहर | 3 |