कविता
| तारीख | लेखक | प्रतिसाद | |
|---|---|---|---|
| घे उत्तुंग भरारी, | अनिल तापकीर | 4 | |
| ओढ तुझी | आर्णव | 6 | |
| 'माझा' 'मी' 'मी' 'मी' चा पाढा, आजपण तू ऐकशील का..? | मोदक | 165 | |
| सखे ... | प्रसाद गोडबोले | 29 | |
| नकोस | अज्ञातकुल | 7 | |
| स्त्रीस श्रद्धांजली | सांजसंध्या | 15 | |
| मी नव्याने कोवळा झालो... | धन्या | 50 | |
| नि:शब्द .... मी ! | विदेश | 4 | |
| शेरनीच्या जबड्यात ससा (हझल) | गंगाधर मुटे | 5 | |
| खोल खोल मनामध्ये... | वेणू | 8 | |
| पुरुषार्थ | विदेश | 2 | |
| आता तरी मानवा सावध होशील का ? | शिवप्रसाद | 10 | |
| प्रांतिक किंवा भाषीय वाद | पंकज रुगे | 3 | |
| "माझ्या सर्व विध्यार्थी मित्रांसाठी" | शिवप्रसाद | 22 | |
| मी बिभीषण एकटा | चाणक्य | 18 | |
| राधा | रेशा | 17 | |
| येशील? | मिसळलेला काव्यप्रेमी | 36 | |
| वेदना | kanchanbari | 5 | |
| चुप्प! | मिसळलेला काव्यप्रेमी | 29 | |
| शांती नवं वर्षातली | अत्रुप्त आत्मा | 35 |