कविता
| तारीख | लेखक | प्रतिसाद | |
|---|---|---|---|
| मैत्रि... | DTPS | 4 | |
| ओंजळीने ती जसा,झाकून घेते चेहरा... | सत्यजित... | 43 | |
| ऐसी काये केली करणी काय जाणो | सागरलहरी | 4 | |
| स्वप्नांचे कवडसे | शिवोऽहम् | 15 | |
| जन पळभर करतिल हाय हाय | मूखदूर्बळ | 8 | |
| कास्तकारी :( | अॅस्ट्रोनाट विनय | 9 | |
| सुगंध | शिव कन्या | 4 | |
| ये, दिग्बन्ध तोडून ये, | अनन्त्_यात्री | 11 | |
| अता ही भेट टळणे शक्य आहे .. | drsunilahirrao | 7 | |
| ती एकदाच दिसली... | सत्यजित... | 14 | |
| डिअरपिअर...मॅकबेथले... काळाची उधई गिळी टाकई! | माहितगार | 0 | |
| पुस्तकदिनानिमित्त विडंबन- (बघ माझी आठवण येते का?) | स्वामी संकेतानंद | 5 | |
| काही कविता अशा..तर काही तशा! - भाग १ | पद्मावति | 22 | |
| वचन | संदीप-लेले | 0 | |
| त्याची कविता, माझी कविता | अनन्त्_यात्री | 16 | |
| हीच तर सुरुवात आहे... | सत्यजित... | 2 | |
| रच्याक्ने कच्ची पोळी हाकानाका | माहितगार | 4 | |
| (नारंगीभारल्या रात्री होत्या) | दशानन | 7 | |
| घोर हा घनघोर आहे! | सत्यजित... | 2 | |
| गंधभारल्या रात्री होत्या... | सत्यजित... | 16 |